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सोमवार, 2 नवंबर 2015

महेंद्र भटनागर के गीत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



गाओ कि जीवन..

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गाओ कि जीवन - गीत बन जाये !
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हर क़दम पर  आदमी  मजबूर है,
हर  रुपहला  प्यार-सपना  चूर है,
आँसुओं के सिन्धु में   डूबा  हुआ
आस-सूरज   दूर,  बेहद  दूर है !
                   गाओ कि कण-कण मीत बन जाये !
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हर तरफ़  छाया अँधेरा  है  घना,
हर हृदय हत,  वेदना  से है सना,
संकटों का  मूक  साया  उम्र भर
क्या रहेगा  शीश पर  यों ही बना ?
                   गाओ,  पराजय - जीत बन जाये !
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साँस पर  छायी विवशता  की घुटन,
जल रही है  ज़िन्दगी भर कर जलन,
विष भरे   घन-रज कणों से है भरा
आदमी की   चाहनाओं   का गगन,
                   गाओ कि दुख - संगीत बन जाये !


मोह-माया..

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सोनचंपा-सी तुम्हारी याद  साँसों में  समायी है !
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          हो किधर तुम मल्लिका-सी रम्य तन्वंगी,
          रे कहाँ अब  झलमलाता रूप  सतरंगी,
मधुमती-मद-सी तुम्हारी मोहिनी रमनीय छायी है !
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          मानवी प्रति कल्पना की कल्प-लतिका बन,
          कर गयीं जीवन जवा-कुसुमों  भरा उपवन,
खो सभी, बस, मौन मन-मंदाकिनी हमने बहायी है !
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          हो किधर तुम , सत्य मेरी मोह-माया री,
          प्राण की आसावरी,  सुख धूप-छाया  री,
राह जीवन की  तुम्हारी चित्रसारी  से सजायी  है !


रात बीती..

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याद रह-रह आ रही है,
रात  बीती जा रही है !
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ज़िन्दगी के आज इस  सुनसान में
जागता हूँ   मैं   तुम्हारे ध्यान में
          सृष्टि सारी सो गयी है,
          भूमि लोरी गा रही है !
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झूमते हैं चित्र  नयनों में  कयी
गत तुम्हारी बात हर लगती नयी
          आज तो गुज़रे दिनों की
          बेरुख़ी भी  भा रही  है !
.
बह रहे हैं हम  समय की धार में,
प्राण ! रखना, पर भरोसा प्यार में,
          कल खिलेगी उर-लता जो
          किस  क़दर मुरझा रही है !
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भोर होती है..

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और अब आँसू बहाओ मत
                   भोर होती है !
.
दीप सारे  बुझ  गये
                   आया  प्रभंजन,
सब सहारे  ढह गये
                   बरसा प्रलय-घन,
हार, पंथी ! लड़खड़ाओ मत
                    भोर होती है !
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बह रही बेबस  उमड़
                   धारा विपथगा,
घोर अँधियारी  घिरी
                   स्वच्छंद  प्रमदा,
आस सूरज की मिटाओ मत
                   भोर होती है !


कौन हो तुम..

                                                                               
कौन हो तुम, चिर-प्रतीक्षा-रत,
आधी अँधेरी रात में ?
.
उड़ रहे हैं घन तिमिर के
सृष्टि के इस छोर से उस छोर तक,
मूक इस  वातावरण को
देखते  नभ के सितारे एकटक,
कौन हो तुम, जागतीं जो इन सितारों के घने संघात में ?
.
जल रहा यह दीप किसका
ज्योति अभिनव ले कुटी के द्वार पर,
पंथ पर  आलोक  अपना
दूर तक बिखरा रहा विस्तार भर,
कौन है यह दीप,जलता जो अकेला,तीव्र गतिमय वात में ?
.
कर रहा है आज कोई
बार-बार प्रहार मन की बीन पर,
स्नेह काले लोचनों से
युग-कपोलों पर रहा रह-रह बिखर,
कौन-सी ऐसी व्यथा है, रात में जगते हुए जलजात में ?
.

यह न समझो..


यह न समझो कूल मुझको मिल गया
आज भी जीवन-सरित मँझधार में हूँ !
.
          प्यार मुझको धार से
          धार के  हर वार से
          प्यार है  बजते  हुए
          हर लहर के तार से,
यह न समझो घर सुरक्षित मिल गया
आज भी  उघरे हुए  संसार में  हूँ !
.
          प्यार भूले  गान से
          प्यार हत अरमान से
          ज़िन्दगी में हर क़दम
          हर  नये  तूफ़ान से,
यह न समझो इंद्र - उपवन मिल गया
आज भी  वीरान में, पतझार  में हूँ !
.
          खोजता हूँ नव-किरन
          रुपहला जगमग गगन,
          चाहता  हूँ   देखना  
          एक प्यारा-सा  सपन,
यह न समझो चाँद मुझको मिल गया
आज भी चारों तरफ़ अँधियार में हूँ !


जिजीविषा


जी रहा है  आदमी
प्यार ही की चाह में !
.
पास उसके गिर रही हैं बिजलियाँ,
घोर गह-गह कर घहरती आँधियाँ,
          पर, अजब विश्वास ले
          सो रहा है  आदमी

          कल्पना की छाँह में !
.
पर्वतों की सामने ऊँचाइयाँ,
खाइयों की घूमती गहराइयाँ,
          पर, अजब विश्वास ले
          चल रहा है  आदमी
          साथ पाने  राह में !
.
बज रही हैं मौत की शहनाइयाँ,
कूकती  वीरान हैं  अमराइयाँ,
          पर, अजब विश्वास ले
          हँस  रहा है  आदमी
          आँसुओं में, आह में !


महेंद्र भटनागर


Retd. Professor
110, BalwantNagar, Gandhi Road,
GWALIOR — 474 002 [M.P.] INDIA
M - 81 097 30048
Ph.-0751- 4092908
E-Mail : drmahendra02@gmail.com


महेंद्र भटनागर



  • जन्म- 26 जून, 1926, झाँसी (उ.प्र.) भारत। 
  • शिक्षा- एम.ए., पी-एच. डी. (हिंदी)।
  • संप्रति- अध्यापन, मध्य-प्रदेश महाविद्यालयीन शिक्षा / शोध-निर्देशक : हिंदी भाषा एवं साहित्य। 
  • कृतियाँ- 30 कविता संग्रह और 11 आलोचना ग्रंथों के रचयिता डॉ. महेंद्र भटनागर ने रेखा चित्र, तथा बाल व किशोर साहित्य की रचना भी की है। उनका समग्र साहित्य संकलित हो चुका है और कविताएँ अनेक विदेशी भाषाओं एवं अधिकांश भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर पुस्तकाकार में प्रकाशित हो चुकी हैं। व कुछ पत्रिकाओं के संपादन से भी जुड़े रहे हैं। अनेक छात्रों व विद्वानों द्वारा आपकी कृतियों के ऊपर अनेक अध्ययन प्रस्तुत किए गए हैं।
  • पुरस्कार- सम्मान मध्य-भारत एवं मध्य-प्रदेश की कला व साहित्य-परिषदों द्वारा सन 1952, 1958, 1960, 1989 में पुरस्कृत; मध्य-भारत हिंदी साहित्य सभा, ग्वालियर द्वारा 'हिंदी-दिवस 1979' पर सम्मान, 2 अक्तूबर 2004 को, 'गांधी-जयंती' के अवसर पर, 'ग्वालियर साहित्य अकादमी'-द्वारा 'डा. शिवमंगलसिंह' सुमन'- अलंकरण / सम्मान, मध्य-प्रदेश लेखक संघ, भोपाल द्वारा 'डा. संतोष कुमार तिवारी - समीक्षक-सम्मान' (२००६) एवं अन्य अनेक सम्मान। 
  • जालघर :  www.rachnakar@blogspot.com  
  • ईमेल : drmbhatnagargwl@rediffmail.com

सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

कल्पना रामानी के गीत


विनोद शाही की कलाकृति

बेटियों नाव बचानी है..


खुद थामो पतवार,
बेटियों, नाव बचानी है।
मझधारे से तार,
तीर तक लेकर जानी है।

क्यों निर्भर हो तुम समाज पर।
जिसकी नज़रें सिर्फ राज पर।
तमगा उससे छीन बेटियों,
करो दस्तखत स्वयं आज पर।

पत्थर की इस बार
मिटे, जो रेख पुरानी है।

यह समाज बैठा है तत्पर।
गहराई तक घात लगाकर।
तुम्हें घेरकर चट कर लेगा,
मगरमच्छ ये पूर्ण निगलकर।

हो जाए लाचार,
इस तरह, जुगत भिड़ानी है।

हों वज़ीर के ध्वस्त इरादे।
कुटिल चाल चल सकें न प्यादे।
इस बिसात का हर चौख़ाना,
एक सुरक्षित कोट बना दे।

निकट न फटके हार,
हरिक यूँ गोट जमानी है।


खुशबू के पल भीने से..


खुशबू के पल भीने से 
रंग चले निज गेह, सिखाकर
मत घबराना जीने से।
जंग छेड़नी है देहों को,
सूरज, धूप, पसीने से।

शीत विदा हो गई पलटकर।
लू लपटें हँस रहीं झपटकर।
वनचर कैद हुए खोहों में,
पाखी बैठे नीड़ सिमटकर।

सुबह शाम जन लिपट रहे हैं,
तरण ताल के सीने से।

तले भुने पकवान दंग हैं।
शायद इनसे लोग तंग हैं।
देख रहे हैं टुकुर-टुकुर वे,
फल, सलाद, रस के प्रसंग हैं।

मात मिली भारी वस्त्रों को,
गात सज रहे झीने से।

गोद प्रकृति की हर मन भाई।
दुपहर एसी कूलर लाई।
बतियाती है रात देर तक,
सुबह गीत गाती पुरवाई।

बाँट रहे गुल बाग-बाग में,
खुशबू के पल भीने से।


गीत कोकिला गाती रहना..


बने रहें ये दिन बसंत के,
गीत कोकिला गाती
रहना।

मंथर होती गति जीवन की,
नई उमंगों से भर जाती।
कुंद जड़ें भी होतीं स्पंदित,
वसुधा मंद-मंद मुसकाती।

देखो जोग न ले अमराई,
उससे प्रीत जताती
रहना।

बोल तुम्हारे सखी घोलते,
जग में अमृत-रस की धारा।
प्रेम-नगर बन जाती जगती,
समय ठहर जाता बंजारा।

झाँक सकें ना ज्यों अँधियारे,
तुम प्रकाश बन आती
रहना।

जब फागुन के रंग उतरकर,
होली जन-जन संग मनाएँ।
मिलकर सारे सुमन प्राणियों
के मन स्नेहिल भाव जगाएँ।

तब तुम अपनी कूक-कूक से
जय उद्घोष गुँजाती
रहना।


गुलमोहर की छाँव..



गुलमोहर की छाँव, गाँव में
काट रही है दिन एकाकी।

ढूँढ रही है उन अपनों को,
शहर गए जो उसे भुलाकर।
उजियारों को पीठ दिखाई,
अँधियारों में साँस बसाकर।

जड़ पिंजड़ों से प्रीत जोड़ ली,
खोकर रसमय जीवन-झाँकी।

फल वृक्षों को छोड़ उन्होंने,
गमलों में बोन्साई सींचे।
अमराई आँगन कर सूने,
इमारतों में पर्दे खींचे।

भाग दौड़ आपाधापी में,
बिसरा दीं बातें पुरवा की।

बंद बड़ों की हुई चटाई,
खुली हुई है केवल खिड़की।
किसको वे आवाज़ लगाएँ,
किसे सुनाएँ मीठी झिड़की।

खबरें कौन सुनाए उनको,
खेल-खेल में अब दुनिया की।

फिर से उनको याद दिलाने,
छाया ने भेजी है पाती।
गुलमोहर की शाख-शाख को
उनकी याद बहुत है आती।

कल्प-वृक्ष है यहीं उसे,
पहचानें और न कहना बाकी।


पंछी उदास हैं..



गाँवों के पंछी उदास हैं
देख-देख सन्नाटा भारी।

जब से नई हवा ने अपना,
रुख मोड़ा शहरों की ओर।
बंद किवाड़ों से टकराकर,
वापस जाती है हर भोर।

नहीं बुलाते चुग्गा लेकर,
अब उनको मुंडेर, अटारी।

हर आँगन के हरे पेड़ पर,
पतझड़ बैठा डेरा डाल।
भीत हो रहा तुलसी चौरा,
देख सन्निकट अपना काल।

बदल रहा है अब तो हर घर,
वृद्धाश्रम में बारी-बारी।

बतियाते दिन मूक खड़े हैं।
फीकी हुई सुरमई शाम।
घूम-घूम कर ऋतु बसंत की,
हो निराश जाती निज धाम।

गाँवों के सुख राख़ कर गई,
शहरों की जगमग चिंगारी।


कल्पना रामानी 


  • जन्म तिथि-6 जून 1951 (उज्जैन-मध्य प्रदेश) 
  • शिक्षा-हाईस्कूल तक 
  • रुचि- गीत, गजल, दोहे कुण्डलिया आदि छंद-रचनाओं में विशेष रुचि।  
  • वर्तमान में वेब की सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रिका ‘अभिव्यक्ति-अनुभूति’ की सह संपादक। 
  • प्रकाशित कृतियाँ-नवगीत संग्रह-‘हौसलों के पंख’ 
  • निवास-मुंबई महाराष्ट्र  
  • ईमेल- kalpanasramani@gmail.com

सोमवार, 7 सितंबर 2015

राधेश्याम बन्धु के गीत




चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



    कोलाहल हो या सन्नाटा



     कोलाहल हो
     या सन्नाटा, कविता सदा सृजन करती है,
     जब भी आंसू
     हुआ पराजित, कविता सदा जंग लड़ती है ।

     जब भी कर्ता हुआ अकर्ता
     कविता ने जीना सिखलाया,
     यात्रायें जब मौन हो  गयीं
     कविता ने चलना सिखलाया ।

     जब भी तम का
     जुल्म बढ़ा है,कविता नया सूर्य गढ़ती है ।

     गीतों  की जब पफसलें लुटतीं,
     शीलहरण होता कलियों का,
     शब्दहीन जब हुर्इ चेतना -
     तब-तब चैन लुटा गलियों का ।

     जब कुर्सी का
     कन्श गरजता,कविता स्वयं कृष्ण बनती है ।

     अपने भी हो गये पराये,
     यूं झूठे अनुबन्ध हो गये,
     घर में ही वनवास हो रहा,
     यूं गूंगे सम्बन्ध हो गये ।

     जब रिश्तों
     पतझड़ हंसता, कविता मेघदूत रचती है,
     कोलाहल हो या
     सन्नाटा, कविता सदा सृजन करती है ।
                   

     

   बैठकर नेपथ्य में



     बैठकर
     नेपथ्य में क्यों स्वयं से लड़ते ?
         जो नहीं
         हमदर्द हैं वे शब्द क्यों गढ़ते ?

     कभी पर्दे को उठा
     आकाश आने दो ।
     मौलश्री की गंध को
     भी गुनगुनाने दो ।

         कभी पंछी की
         चहक से, क्यों नहीं मिलते ?

     क्यों नयन की झील में है
     एक सन्नाटा ?
     हर कुहासे को सुबह की
     हंसी ने छांटा।

         क्यों सुनहले
         दिवस की मुस्कान से डरते ?

     प्यार के किरदार को
     मिलती सभी खुशियां,
     सृजन के ही मंच पर,
     मिलती सुखद छवियां ।

         क्यों न बादल
         बन किसी की तपन को हरते ?

     जो कला से दूर हैं
     वह जिन्दगी से दूर,
     पंखुड़ी के पास जो  हैं
     गंध से भरपूर।

         क्यों न अर्पण
         गंध बन हर हृदय में बसते ?
         बैठकर
         नेपथ्य में क्यों स्वयं से लड़ते ?
             


    अभी परिन्दों में  धड़कन है



     अभी परिन्दों में
     धड़कन है, पेड़ हरे हैं जिन्दा धरती,

     मत उदास हो
     छाले लखकर, ओ राही नदिया कब थकती ?

     चांद भले ही बहुत दूर हो
     पथ में नित चांदनी बिछाता,
     हर  गतिमान चरण की खातिर
     बादल खुद छाया बन जाता ।

     चाहे थके
     पर्वतारोही, दिन की धूप नहीं है ती ।

     फिर-फिर समय का पीपल कहता
     बढ़ो हवा की लेकर हिम्मत,
     बरगद का आशीष सिखाता
     खोना नहीं प्यार की दौलत ।

     पथ में रात
     भले घिर आये, दिन की यात्रा कभी न रुकती ।

     कितने ही पंछी बेघर हैं
     नीड़ों में बच्चे बेहाल,
     तम से लड़ने कौन चलेगा
     रोज दिये का यही सवाल?

     पग-पग है
     आंधी की साजि़श,पर मशाल की जंग न थमती,
     मत उदास हो
     छाले लखकर, ओ राही नदिया कब थकती ?
               


    शब्दों के कंधों पर



     शब्दों के
     कंधों पर, बर्फ का जमाव,
     कैसे चल
     पायेगी, कागज की नाव ?

     केसर की क्यारी में
     बारूदी शोर,
     काना फूसी करते,
     बादल मुंहजोर ।
     कुहरे की
     साजि़श से उजड़ रहे गांव ।

     मौसम है आवारा
     हवा भी खिलाफ,
     किरने भी सोयी हैं
     ओढ़कर लिहाफ ।
     सठियाये
     सूरज के ठंढे प्रस्ताव ।

     बस्ती को धमकाती
     आतंकी धूप,
     यौवन को बहकाता
     सिक्कों का रूप ।
     ठिठुरी
     चौपालों में उंफघते अलाव ।

     झुग्गी के हिस्से की
     धूप का सवाल,
     कौन हल करेगा बन
     सत्य की मशाल ?
     संशय के
     शिविरों में, धुन्ध का पड़ाव,
     कैसे चल पायेगी, कागज की नाव ?


               

     मोरपंख सपनों का आहत



     जब-जब क्रौच
     हुआ है घायल, गीत बहुत रोया,

     हर बहेलिए
     की साजि़श में, नीड़ों ने खोया ।

          जब महन्त आकाश ही करे
          बारूदी बौछार,
          पंछी कहां उड़ें फिर जाकर
          अपने पंख पसार ?
          हरियाली लुट गयी प्यार की
          टहनी सूख गयी,
          गूंगी हुर्इ  गांव की कोयल
          खुशियां रूठ गयीं।

     मोरपंख सपनों का
     आहत, डर किसने बोया ?

          चौपालों की चर्चा  में
          नपफरत की जंग छिड़ी
          खेतों में हथियार  उग रहे
          लुटती फसल खड़ी ।
          दाना कौन चुगायेगा
          गौरैया सोच रही ?
          बस कौवे का शोर, कबूतर

          कब से उड़ा नहीं ।


     भूला राम-राम
     भी सुगना, लगता है सोया ।

          पग-पग जहां शिकारी घायल
          किससे बात करे ?
          महानगर में हमदर्दी  का
          मरहम कौन धरे ?
          बाजों की बस्ती में सच की
          मैना हार गयी,
          अब बेकार हुयी ।

     शुतुरमुर्ग ने शीश झुकाकर, जुल्मों को ढोया,
     जब-जब क्रौच हुआ है घायल, गीत बहुत रोया ।

       


राधेश्याम बंधु


  • जन्म:10 जुलाई 1940 को पडरौना उत्तर प्रदेश (भारत) में
  • लेखन:नवगीत, कविता, कहानी, उपन्यास, पटकथा, समीक्षा, निबंध
  • प्रकाशित कृतियाँ-
  • काव्य संग्रह:बरसो रे घन, प्यास के हिरन
  • खंडकाव्य: एक और तथागत
  • कथा संग्रह : शीतघर
  • संपादित:जनपथ, नवगीत, कानपुर की काव्ययात्रा, समकालीन कविता, समकालीन कहानियाँ, नवगीत और उसका युगबोध। इसके साथ ही आपकी रचनाएँ भारत की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं तथा आकाशवाणी व दूरदर्शन से प्रकाशित प्रसारित हो चुकी हैं। वे 'समग्र चेतना' नामक पत्रिका के संपादक भी है।
  • पुरस्कार: भारत के प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा 'एक और तथागत' के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के 'जयशंकर प्रसाद पुरस्कार' तथा हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा पुरस्कृत व सम्मानित।
  • टेली फ़िल्में: बन्धुजी अपनी कथा/पटकथा पर आधारित 3 टेली-फ़िल्में- 'रिश्ते', 'संकल्प' और 'कश्मीर एक शबक' तथा 'कश्मीर की बेटी' धारावाहिक बना चुके हैं।
  • सम्प्रति: सहायक महाप्रबन्धक दूरसंचार किदवई भवन नई दिल्ली के पद से 2000 में सेवानिवृत्त।
  • सम्पर्क: बी-3/163, यमुना विहार, दिल्ली-110053