सोमवार, 7 मार्च 2016

पुस्तक समीक्षा: कविता के गर्भ से-अरुण देव




                                  

                             आज हमारे बीच भर गई हैं खामोशियाँ..


कविता मनुष्यता की मातृभाषा है. कविता में ही वह अपने सुख-दुःख, यातनाएं, अनुभव दर्ज़ करता आया है. सामाजिक जटिलता बढ़ने से कवि-कर्म कठिन हुआ है. इसमें अब श्वेत-श्याम अनुभव नहीं होते. इसमें बहुत कुछ ‘ग्रे’ होता है. जिसे समझना धैर्य के साथ ही संभव है. दीर्घ परंपरा के कारण कविता में कुछ भी कहना भी बड़ी तैयारी की मांग करता है. जिस परंपरा में कालिदास, कबीर, ग़ालिब, प्रसाद और मुक्तिबोध हुए हों, जिसमें केदारनाथ सिंह और विष्णु खरे लिख रहे हों, उसमें कुछ भी अलहदा लिखना और अपनी पहचान सुनिश्चित करना आसान नहीं है. 

युवा कवि कुमार लव का पहला कविता संग्रह – ‘गर्भ में’ मेरे सामने हैं. कविताएँ 6  खंडों में विभक्त हैं. एक ही संग्रह में कविताओं के लिए 6 अलग-अलग खंड ऐसा संकेत करते हैं कि कवि अपने को अनुभवों में इतना विस्तृत पाता है कि उसे किसी एक शीर्षक में नहीं बाधा जा सकता. हालांकि कई बार ऐसे विभाजन एक रेटारिक की तरह लगते हैं और ऊब पैदा करते हैं. हिंदी कविता में प्रयोगशीलता की भी एक परंपरा है ओर प्रयोग के लिए भी परंपरा में दक्ष होना होता है. परंपराभंजक परंपराओं के साधक होते हैं.   

‘विसंवादी’ खंड के अंतर्गत ‘खामोशियाँ’ में कवि की कोशिशें रंग लाती हैं और ऐसा लगता है कि इसमें काव्याभास से आगे बढ़कर कुछ कहा गया है और सलीके से कहा गया है- 

“कभी हमें घेरे खड़ी थीं
आज हमारे बीच भर गई हैं
खामोशियाँ”

शब्दों का शूल बनना, शोर बनना और फिर अर्थहीन हो जाना अर्थगर्भित है. इसी खंड की अगली कविता भी सुखद अहसास है जब कवि सधे शिल्प में आज के क्षण-जीवी दर्शन को व्यक्त करता है-

‘पर,
पूर्णता 
एक क्षण से ज्यादा
कहाँ रहती है ?’ 

जटिल यांत्रिकता ने सहज मानवीयता के लिए जगहें नहीं छोड़ी हैं. एक सच्चा सीधा प्रेम भी अब सीधे ढंग से अभिव्यक्त नहीं हो सकता. शब्दों को दीमक लग गई है. कवि कहता है –

‘पर अब भी
चाहता हूँ थामना 
तुम्हारा हाथ,
छूना तुम्हारा मन,
कहना फिर से ..’

कविता की विश्वसनीयता के लिए यह जरूरी है कि वह कवि के जीवनानुभवों से निकले और फिर शिल्प में ढल जाए.प्रेम से संबंधित कविताओं में सच्चाई की एक महक है जो बरबस ध्यान खींचती हैं

‘प्रतीक्षा
तुम्हारे कमल से उठती
गंध की’

संवेदनशील मन अपने को ‘अनफिट’ पाता है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं. ‘एलिनियेशन’ इस सभ्यता की सबसे बड़ी बीमारी है. उत्पाद से उत्पादक का अपरिचय बढ़ते-बढ़ते हमारे संबंधों में घुस जाता है. और कई बार तो हम खुद से अपरिचित हो जाते हैं. प्रचार माध्यमों का दबाव एक नितांत ही बनावटी जीवनशैली के लिए बाध्य करता है. इसका बोझ सहन करते-करते आत्मा बीमार पड़ जाती है. कवि ईश्वर से कहता है-

‘ईश्वर,
गलती हो गई आपसे
दुनिया बनाई मेरे लिए
पर गलत नाप की’

कुछ कविताओं में बिंबों का प्रयोग सुंदर है और प्रभावशाली भी. ‘हे राम’ शीर्षक कविता में कवि कहता है-

‘शायद भूल गए हैं वे पिछले संग्राम
जिनमें खून बरसा था
गहरी नींद में सोए शहरों पर’ 

कुछ आकार में छोटी कविताएँ सुघड़ हैं और मन में बसी रह जाती हैं- 

‘कुछ भीगे ख्वाब थे
बिछाए थे सुखाने के लिए
कमरे भर में सीलन भर गई.’ 

डॉ देवराज के शब्दों में कहा जाए तो कविता में प्रयोगों की लाक्षणिकता के गहरे अर्थ हैं. कविताओं के चयन में और सावधानी की दरकार थी.

  • समीक्षित कृति : ‘गर्भ में’ / कुमार लव/ 2015/
  • तक्षशिला प्रकाशन, 98-ए, हिंदी पार्क, 
  • दरियागंज, नई दिल्ली - 110002/ 
  • पृष्ठ – 136/ मूल्य – रु. 300/- 

2 टिप्‍पणियां:

  1. अर्थ देती समीक्षा ।अहसास तो हैं पर विश्वास भरा नही शब्दावली केवल चमत्कार दे अपूर्ण होगा भीतर का मंथन हो ।
    सुंदर व सटीक समीक्षा ।बधाई सुबोध जी श्री वास्तव ।

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