सोमवार, 3 अगस्त 2015

श्रीकांत वर्मा की कविताएँ


विनोद शाही की कलाकृति

हस्तिनापुर का रिवाज


मै फिर कहता हूं
धर्म नहीं रहेगा तो कुछ नहीं रहेगा
मगर मेरी कोई नहीं सुनता
हस्तिनापुर में सुनने का रिवाज नहीं
तब सुनो या मत सुनो
हस्तिनापुर के निवासियो! होशियार
हस्तिनापुर में/ तुम्हारा
एक शत्रु पल रहा है विचार
और याद रक्खो
आजकल महामारी की तरह फैल जाता है
विचार


प्रजापति


इस भयानक समय
में कैसे लिखूं
और कैसे नहीं लिखूं?
सैकड़ों वर्षों से सुनता आ रहा हूं
घृणा नहीं प्रेम करो-
किससे करूं प्रेम?
मेरे चारों ओर हत्यारे हैं
मुकुटहीन
इस नग्न शरीर पर
मुकुट प्रतिष्ठा का
यदि कभी नहीं आया
तो कारण है
यह किसी
शक्ति कुल के सिक्कों पर
बिका नहीं।

युद्धनायक
यूरोप
बडबडा रहा है बुखार में
अमेरिका
पूरी तरह भटक चुका है
अंधकार में
एशिया पर
बोझ है गोरे इंसान का
संभव नहीं है
कविता में वह सब कह पाना
जो घटा है बीसवीं शताब्दी में
मनुष्य के साथ
कांपते हैं हाथ
पृथ्वी की एक-एक सड़क पर
भाग रहा है मनुष्य
युद्ध पीछा कर रहा है


श्रीकांत वर्मा 


  • जन्म-18 सितंबर 1931 बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
  • निधन: 1986
  • प्रमुख कृतियाँ-भटका मेघ (1957), मायादर्पण (1967), दिनारम्भ (1967), जलसाघर (1973), मगध (1984)।
  • सम्मान-1973 में मध्यप्रदेश सरकार का 'तुलसी पुरस्कार'; 1983 में 'आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी' पुरस्कार; 1980 में 'शिखर सम्मान'; 1984 में कविता पर केरल सरकार का कुमार आशान पुरस्कार; 1987 में मगध नामक कविता संग्रह के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार।

1 टिप्पणी:

  1. वाह !१-राह अनगढ़ ही सही चलते चलो चलते चलो |
    मंजिले`अपने आप कदम चूमेंगी चलते चलो ||.....
    २-आप ने जो कुछ लिखा गर सच लिखा
    कौआ आम खायेगा किसने वह लिखा ||......
    ३ -सरजू के तीरे तीरे चलें हनुमान जी,
    काहें बदे रूठल म्हारे हनुमान जी|
    सरजू के तीरे तीरे चलें हनुमान जी,
    लड्डू बदे रूठल बाटें हमरे महाबीर जी||......

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