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बुधवार, 21 जून 2017

पुस्तक समीक्षा: उम्मीदों की फसल उगाते नवगीत-सुरेन्द्र सिंह पॅवार




                                   पुस्तक समीक्षा-काल है संक्राति का


      ‘काल है संक्रांति का’ 'सलिल' जी की दूसरी पारी का प्रथम गीत-नवगीत संग्रह है। ‘सलिल’ जी की शब्द और छन्द के प्रति अटूट निष्ठा है। हिन्दी पञ्चांग और अंग्रेजी कलेण्डर में मकर संक्रांति एक ऐसा पर्व है जो प्रतिवर्ष चौदह जनवरी को मनाया जाता है। इस दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। इसी दिन से शिशिर ऋतु का एवं उत्तरायण का प्रारंभ माना गया है। इसी के आसपास, गुजरात में पतंगोत्सव, पंजाब में लोहड़ी, तामिलनाडु में पोंगल, केरल में अयप्पा दर्शन, पूर्वी भारत में बिहू आदि पर्वों की वृहद श्रृंखला है जो ऋतु परिवर्तन को लोक पर्व के रूप में मनाकर आनंदित होती है। भारत के क्षेत्र में पवित्र नदियों एवं सरोवरों के तट पर स्नान दान और मेलों की परम्परा है।

       संग्रह के ज्यादातर नवगीत 29 दिसम्बर 2014 से 22 जनवरी 2015 के मध्य रचे गये हैं। यह वह संक्रांति काल है, जब दिल्ली में ‘आप’ को अल्पमत और केजरीवाल द्वारा सरकार न चलाने का जोखिम भरा निर्णय, मध्यप्रदेश सहित कुछ अन्य हिन्दी भाषी राज्यों में भाजपा को प्रचंड बहुमत तथा केन्द्र में प्रधानमंत्री मोदी जी की धमाकेदार पेशवाई से तत्कालीन राजनैतिक परिदृश्य बदला-बदला सा था। ऐसे में कलम के सिपाही ‘सलिल’ कैसे शांत रहते? उन्हें विषयों का टोटा नहीं था, बस कवि-कल्पना दौड़ाई और मुखड़ों-अंतरों की तुकें मिलने लगी। सलिल जी ने गीत नर्मदा के अमृतस्य जल को प्रत्यावर्तित कर नवगीतरूपी क्षिप्रा में प्रवाहमान, किया, जिसमें अवगाहन कर हम जैसे रसिक श्रोता / पाठक देर तक और दूर तक गोते लगा सकते हैं । कहते है, नवगीत गीत का सहोदर है, जो अपनी शैली आप रचकर काव्य को उद्भाषित करता है । सलिल - संग्रह के सभी गीत नवगीत नहीं हैं परन्तु जो नवगीत हैं वे तो गीत हैं ही । डॉ. नामवरसिंह के अनुसार ‘‘नवगीत अपने नये रूप’ और ‘नयी वस्तु’ के कारण प्रासंगिक हो सका हैं ।’’ क्या है नवगीत का ‘नया रूप’’ एवं ‘नयी वस्तु’? बकौल सलिल - 

नव्यता संप्रेषणों में जान भरती, 
गेयता संवेदनों का गान करती।
कथ्य होता, तथ्य का आधार खाँटा,
सधी गति-यति अंतरों का मान करती।
अंतरों के बाद, मुखड़ा आ विहँसता,
मिलन की मधु बंसरी, है चाह संजनी।
सरलता-संक्षिप्तता से बात बनती,
मर्म बेधकता न हो तो रार ठनती।
लाक्षणिता भाव, रस, रूपक सलोने,
बिम्ब टटकापन मिलें, बारात सजती।
नाचता नवगीत के संग, लोक का मन
ताल-लय बिन, बेतुकी क्यों रहे कथनी।।

       वैसे गीत में आने वाले इस बदलाव की नव्यता की सूचना सर्वप्रथम महाकवि निराला ने ‘‘नवगति नवलय, ताल छन्द नव’’ कहकर बहुत पहले दे दी थी । वास्तव में, नवगीत आम-आदमी के जीवन में आये उतार-चढ़ाव, संघर्ष-उत्पीड़न, दुख-तकलीफ-घुटन, बेकारी, गरीबी और बेचारगी की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है ।

       सलिल जी के प्रतिनिधि नवगीतों के केन्द्र में वह आदमी है, जो श्रमजीवी है, जो खेतों से लेकर फैक्ट्रियों तक खून-सीना बहाता हुआ मेहनत करता है, फिर भी उसकी अंतहीन जिंदगी समस्याओं से घिरी हुई हैं, उसे प्रतिदिन दाने-दाने के लिए जूझना पड़ता है । ‘मिली दिहाड़ी’ नवगीत में कवि ने अपनी कलम से एक ऐसा ही दृश्य उकेरा है -

चाँवल-दाल किलो भर ले ले
दस रुपये की भाजी।
घासलेट का तेल लिटर भर
धनिया-मिर्ची ताजी।

तेल पाव भर फल्ली का
सिंदूर एक पुड़िया दे-
दे अमरुद पाँच का, बेटी की
न सहूँ नाराजी।

खाली जेब पसीना चूता,
अब मत रुक रे मन बेजार ।
मिली दिहाड़ी, चल बाजार ।।

         नवगीतों ने गीत को परम्परावादी रोमानी वातावरण से निकालकर समष्टिवादी यथार्थ और लोक चेतना का आधार प्रदान करके उसका संरक्षण किया है। सलिल जी के ताजे नवगीतों में प्रकृति अपने समग्र वैभव और सम्पन्न स्वरूप में मौजूद है। दक्षिणायन की हाड़ कँपाती हवाएँ हैं तो खग्रास का सूर्यग्रहण भी है । सूर्योदय पर चिड़िया का झूमकर गाया हुआ प्रभाती गान है तो राई-नोन से नजर उतारती कोयलिया है -

ऊषा किरण रतनार सोहती ।
वसुधा नभ का हृदय मोहती ।
कलरव करती मुनमुन चिड़िया
पुरवैया की बाट जोहती ।।

गुनो सूर्य लाता है
सेकर अच्छे दिन ।।

          सलिल जी ने नवगीतों में सामाजिक-राजनैतिक विकृतियों एवं सांस्कृतिक पराभवों की काट में पैनी व्यंजक शैली अपनाते हुए अपनी लेखनी को थोड़ा टेढ़ा किया है । ‘शीर्षासन करती सियासत’, ‘नाग-साँप फिर साथ हुए’, ‘राजनीति तज दे तन्दूर’, ‘गरीबी हटाओ की जुमलेबाजी’, ‘अच्छे दिन जैसे लोक लुभावन नारे धारा तीन सौ सत्तर, काशी-मथुरा-अवध जैसे सभी विषय इन नवगीतो में रूपायित हुए हैं -

मंजिल पाने साथ चले थे
लिये हाथ में हाथ चले थे
दो मन थे, मत तीन हुए फिर
ऊग न पाये, सूर्य ढले थे

जनगण पूछे
कहें 'खैर है'

अथवा

हम में हर एक तीसमारखाँ 
कोई नहीं किसी से कम।
हम आपस में उलझ-उलझ कर
दिखा रहे हैं अपनी दम।
देख छिपकली डर जाते पर
कहते डरा न सकता यम।
आँख के अंधे, देख न देखें
दरक रही है दीवारें।

          देखा जा रहा है कि नवगीत का जो साँचा आज ये 60-65 वर्ष पूर्व तैयार किया गया था, कुछ नवगीतकार उसी से चिपक कर रह गये हैं। आज भी वे सीमित शब्द, लय और बिम्बात्मक सम्पदा के आधार पर केवल पुनरावृत्ति कर रहे हैं। सलिल जी जैसे नवगीतकार ही हैं, जो लीक से हटने का साहस जुटा पा रहे हैं, जो छंद को भी साध रहे हैं और बोध को भी। सलिल जी के इन नवगीतों में परम्परागत मात्रिक और वर्णिक छंदों का अभिनव प्रयोग देखा गया है। विशेषकर दोहा, सोरठा, हरिगीतिका, आल्हा और सवैया का । इनमें लोक से जुड़ी भाषा है, धुन है, प्रतीक हैं। इनमें चूल्हा-सिगड़ी है, बाटी-भरता-चटनी है, लैया-गजक है, तिल-गुड़ वाले लडुआ हैं, सास-बहू, ननदी-भौनाई के नजदीकी रिश्ते हैं, चीटी-धप्प, लँगड़ी, कन्नागोटी, पिट्टू, कैरम हैं, रमतूला , मेला, नौटंकी, कठपुतली हैं। ‘सुन्दरिये मुंदरिये, होय’, राय अब्दुला खान भट्टी उर्फ दुल्ला भट्टी की याद में गाये जाने वाला लोहड़ी गीत है, ईसुरी की चौकड़िया फाग पर आधारित -

‘मिलती काय ने ऊँचीवारी, कुर्सी हमखों गुंइया है’।

         सलिल जी के इन गीतों/नवगीतों को लय-ताल में गाया जा सकता है, ज्यादातर तीन से चार बंद के नवगीत हैं। अतः, पढ़ने-सुनने में बोरियत या ऊब नहीं होती। इनमें फैलाव था विस्तार के स्थान पर कसावट है, संक्षिप्तता है। भाषा सहज है, सर्वग्राही है। कई बार सूत्रों जैसी भाषा आनंदित कर देती है। जैसे कि, भवानी प्रसाद तिवारी का एक सुप्रसिद्ध गीत है- ‘‘मनुष्य उठ! मनुष्य को भुजा पसार भेंट ले।’’ अथवा इसी भावभूमि कर चन्द्रसेन विराट का गीत है- ‘‘मिल तो मत मन मारे मिल, खुल कर बाँह पसारे मिल’’ सलिल जी ने भावों के प्रकटीकरण में ‘भुजा-भेंट’ का प्रशस्त-प्रयोग किया है। 

         सलिल द्वारा सूरज के लिए ‘सूरज बबुआ’ का जो सद्य संबोधन दिया है वह आने वाले समय में ‘‘चन्दा मामा’’ जैसी राह पकडे़गा। मिथकों के सहारे जब सलिल के सधे हुए नवगीत आगे बढ़ते हैं तो उनकी बनक उनकी रंगत और उनकी चाल देखते ही बनती है -

अब नहीं है वह समय जब
मधुर फल तुममें दिखा था।
फाँद अम्बर पकड़ तुमको
लपककर मुँह में रखा था।
छा गया दस दिशा तिमिर तब
चक्र जीवन का रुका था।
देख आता वज्र, बालक
विहँसकर नीचे झुका था।

हनु हुआ घायल मगर
वरदान तुमने दिये सूरज।

         और एक बात, सलिल जी नवगीत कवि के साथ-साथ प्रकाशक की भूमिका में भी जागरूक दिखाई दिये, बधाई। संग्रह का आवरण एवं आंतरिक सज्जा उत्कृष्ट है। यदि वे चाहते तो कृति में नवगीतों, पुनर्नवगीतों; जिनमें नवगीतों की परम्परा से इतर प्रयोग हैं और गीतों को पृथक-प्रखंडित करने एवं पाँच गीतों, नवगीतों, वंदन, स्तवन, स्मरण, समर्पण और कथन की सुदीर्घ काव्यमय आत्म कथ्य को सीमित करने का संपादकीय जोखिम अवश्य उठा सकते थे। सलिल जी ने अपने सामाजिक स्तर, आंचलिक भाषा, उपयुक्त मिथक, मुहावरों और अहानो (लोकोक्तियों) के माध्यम से व्यक्तिगत विशिष्टाओं का परिचय देते हुए हमें अपने परिवेश से सहज साक्षात्कार कराया है, इसके लिये वे साधुवाद के पात्र हैं। ‘उम्मीदों की फसल उगाते’ और ‘उजियारे की पौ-बारा’ करते ये नवगीत नया इतिहास लिखने की कुब्बत रखते हैं। ये तो शुरूआत है, अभी उनके और-और स्तरीय नवगीत संग्रह आयेंगे, यही शुभेच्छा है।

  • समीक्ष्य पुस्तक-काल है संक्रांति का (गीत-नवगीत संग्रह)/ आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', प्रथम संस्करण 2016, आकार 22 से.मी. x 13.5 से.मी., आवरण बहुरंगी, पेपरबैक जैकेट सहित, पृष्ठ 128, मूल्य जन संस्करण 200/-, पुस्तकालय संस्करण 300/-, समन्वय प्रकाशन, 204 विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर-482003


सुरेन्द्र सिंह पॅवार


201,शास्त्री नगर गढ़ा,
जबलपुर-3 (म.प्र.)
मोबाईल-9300104296
ईमेल:pawarss2506@gmail.com

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

पुस्तक समीक्षा: ‘सरहदें’-कवि कलम की चाह लेकर सर हदें-आचार्य संजीव सलिल




मूल्यों के अवमूल्यन, नैतिकता के क्षरण तथा संबंधों के हनन को दिनानुदिन सशक्त करती तथाकथित आधुनिक जीवनशैली विसंगतियों और विडंबनाओं के पिंजरे में आदमी को दम तोड़ने के लिये विवश कर रही है। कवि-पत्रकार सुबोध श्रीवास्तव की कविताएँ बौद्धिक विलास नहीं, पारिस्थितिक जड़ता की चट्टान को तोड़ने में जुटी छेनी की तरह हैं। आम आदमी अविश्वास और निजता की हदों में कैद होकर घुट रहा है। सुबोध जी की कविताएँ ऐसी हदों को सर करने की कोशिश से उपजी हैं। कवि सुबोध का पत्रकांर उन्हें वायवी कल्पनाओं से दूरकर जमीनी सामाजिकता से जोड़ता है। उनकी कविताएँ अनुभूत की सहज-सरल अभिव्यक्ति करती हैं। वर्तमान नकारात्मक पत्रकारिता के समय में एक पत्रकांर को उसका कवि आशावादी बनाता है।

सब कुछ खत्म/ नहीं होता
सब कुछ/ खत्म हो जाने के बाद भी
बाकी रह जाता है/कहीं कुछ
फिर सृजन को।
हाँ, एक कतरा उम्मीद भी/ खड़ी कर सकती है
हौसले और विश्वास की/ बुलंद इमारत।

अपने नाम के अनुरूप् सुबोध ने कविताओं को सहज बोधगम्य रखा है। वे आतंक के सरपरस्तों को न तो मच्छर के दहाडने की तरह नकली चुनौती देते हैं, न उनके भय से नतमस्तक होते हैं अपितु उनकी साक्षात शान्ति की शक्ति और हिंसा की निस्सारिता से कराते हैं-

तुम्हें/ भले ही भाती हो
अपने खेतों में खड़ी/ बंदूकों की फसल
लेकिन-/ मुझे आनंदित करती है
पीली-पीली सरसों/ और/दूर तक लहलहाती
गेहूं की बालियों से उपजता/ संगीत।
तुम्हारे बच्चों को/ शायद
लोरियों सा सुख भी देती होगी
गोलियों की तड़तड़ाहट/ लेकिन/सुनो
कभी खाली पेट नहीं भरा करती
बंदूकें/सिर्फ कोख उजाड़ती हैं।

सुबोध की कविताएँ आलंकारिकता का बहिष्कार नहीं करतीं, नकारती भी नहीं पर सुरुचिपूर्ण तरीके कथ्य और भाषा की आवश्यकता के संप्रेषण को अधिक प्रभावी बनाने के लिये उपकरण की तरह अनुरूप उपयोग करती हैं।

उसके बाद/ फिर कभी नहीं मिले/ हम-तुम
लेकिन/ मेरी जिन्दगी को/ महका रही है
अब तक/ खुशबू/तेरी याद की
क्योकि/ यहाँ नहीं है/ कोई सरहद।

‘अहसास’ शीर्षक अनुभाग में संकलित प्रेमपरक रचनाएँ लिजलिजेपन से मुक्त और यथार्थ के समीप हैं।

आँगन में/जरा सी धूप खिली
मुंडेर पे बैठी/ चिडि़या ने/फुदककर
पंखों में छिपा मुंह /बाहर निकाला
और/चहचहाई/तो यूं लगा/कि तुम आ गये।

कवि मानव मन की गहराई से पड़ताल कर, कड़वे सच को भी सहजता और अपनेपन से कह पाता है-

जितना/खौफनाक लगता है/सन्नाटा
उससे भी कहीं ज्यादा/डर पैदा करता है
कोई/खामोश आदमी।
दोनों ही स्थितियां /तकरीबन एक सी हैं
फर्क सिर्फ इतना है कि/सन्नाटा/टूटता है तो
फिर पहले जैसा हो जाता है/माहौल/लेकिन
चुप्पी टूटने पे/ अक्सर/बदला-बदला सा
नज़र आता है/ आदमी।

संग्रह के आकर्षण में डॉ रेखा निगम, अजामिल तथा अशोक शुक्ल ‘अंकुश’ के चित्रों ने वृद्धि की है। प्रतिष्ठित कलमकार दिविक रमेश जी की भूमिका सोने में सुहागे की तरह है।

  • सरहदें (कविता संग्रह)-सुबोध श्रीवास्तव/ ISBN 978-93-83969-72-2 / प्रथम संस्करण-2016 / मूल्य 120 रु.
  • प्रकाशक-अंजुमन प्रकाशन, 942 आर्य कन्या चैराहा, मुटठीगंज, इलाहाबाद 211003,फ़ोन-+91-9453004398
  • कवि संपर्क- 'मॉडर्न विला', 10/518, खलासी लाइंस, कानपुर (उ.प्र.)-208001, फ़ोन-+91-9305540745


समीक्षक: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 


'समन्वयम' 204, विजय अपार्टमेंट,
नेपियर टाउन, जबलपुर-482001
मो. 09425183244
ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

सोमवार, 7 मार्च 2016

पुस्तक समीक्षा: कविता के गर्भ से-अरुण देव




                                  

                             आज हमारे बीच भर गई हैं खामोशियाँ..


कविता मनुष्यता की मातृभाषा है. कविता में ही वह अपने सुख-दुःख, यातनाएं, अनुभव दर्ज़ करता आया है. सामाजिक जटिलता बढ़ने से कवि-कर्म कठिन हुआ है. इसमें अब श्वेत-श्याम अनुभव नहीं होते. इसमें बहुत कुछ ‘ग्रे’ होता है. जिसे समझना धैर्य के साथ ही संभव है. दीर्घ परंपरा के कारण कविता में कुछ भी कहना भी बड़ी तैयारी की मांग करता है. जिस परंपरा में कालिदास, कबीर, ग़ालिब, प्रसाद और मुक्तिबोध हुए हों, जिसमें केदारनाथ सिंह और विष्णु खरे लिख रहे हों, उसमें कुछ भी अलहदा लिखना और अपनी पहचान सुनिश्चित करना आसान नहीं है. 

युवा कवि कुमार लव का पहला कविता संग्रह – ‘गर्भ में’ मेरे सामने हैं. कविताएँ 6  खंडों में विभक्त हैं. एक ही संग्रह में कविताओं के लिए 6 अलग-अलग खंड ऐसा संकेत करते हैं कि कवि अपने को अनुभवों में इतना विस्तृत पाता है कि उसे किसी एक शीर्षक में नहीं बाधा जा सकता. हालांकि कई बार ऐसे विभाजन एक रेटारिक की तरह लगते हैं और ऊब पैदा करते हैं. हिंदी कविता में प्रयोगशीलता की भी एक परंपरा है ओर प्रयोग के लिए भी परंपरा में दक्ष होना होता है. परंपराभंजक परंपराओं के साधक होते हैं.   

‘विसंवादी’ खंड के अंतर्गत ‘खामोशियाँ’ में कवि की कोशिशें रंग लाती हैं और ऐसा लगता है कि इसमें काव्याभास से आगे बढ़कर कुछ कहा गया है और सलीके से कहा गया है- 

“कभी हमें घेरे खड़ी थीं
आज हमारे बीच भर गई हैं
खामोशियाँ”

शब्दों का शूल बनना, शोर बनना और फिर अर्थहीन हो जाना अर्थगर्भित है. इसी खंड की अगली कविता भी सुखद अहसास है जब कवि सधे शिल्प में आज के क्षण-जीवी दर्शन को व्यक्त करता है-

‘पर,
पूर्णता 
एक क्षण से ज्यादा
कहाँ रहती है ?’ 

जटिल यांत्रिकता ने सहज मानवीयता के लिए जगहें नहीं छोड़ी हैं. एक सच्चा सीधा प्रेम भी अब सीधे ढंग से अभिव्यक्त नहीं हो सकता. शब्दों को दीमक लग गई है. कवि कहता है –

‘पर अब भी
चाहता हूँ थामना 
तुम्हारा हाथ,
छूना तुम्हारा मन,
कहना फिर से ..’

कविता की विश्वसनीयता के लिए यह जरूरी है कि वह कवि के जीवनानुभवों से निकले और फिर शिल्प में ढल जाए.प्रेम से संबंधित कविताओं में सच्चाई की एक महक है जो बरबस ध्यान खींचती हैं

‘प्रतीक्षा
तुम्हारे कमल से उठती
गंध की’

संवेदनशील मन अपने को ‘अनफिट’ पाता है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं. ‘एलिनियेशन’ इस सभ्यता की सबसे बड़ी बीमारी है. उत्पाद से उत्पादक का अपरिचय बढ़ते-बढ़ते हमारे संबंधों में घुस जाता है. और कई बार तो हम खुद से अपरिचित हो जाते हैं. प्रचार माध्यमों का दबाव एक नितांत ही बनावटी जीवनशैली के लिए बाध्य करता है. इसका बोझ सहन करते-करते आत्मा बीमार पड़ जाती है. कवि ईश्वर से कहता है-

‘ईश्वर,
गलती हो गई आपसे
दुनिया बनाई मेरे लिए
पर गलत नाप की’

कुछ कविताओं में बिंबों का प्रयोग सुंदर है और प्रभावशाली भी. ‘हे राम’ शीर्षक कविता में कवि कहता है-

‘शायद भूल गए हैं वे पिछले संग्राम
जिनमें खून बरसा था
गहरी नींद में सोए शहरों पर’ 

कुछ आकार में छोटी कविताएँ सुघड़ हैं और मन में बसी रह जाती हैं- 

‘कुछ भीगे ख्वाब थे
बिछाए थे सुखाने के लिए
कमरे भर में सीलन भर गई.’ 

डॉ देवराज के शब्दों में कहा जाए तो कविता में प्रयोगों की लाक्षणिकता के गहरे अर्थ हैं. कविताओं के चयन में और सावधानी की दरकार थी.

  • समीक्षित कृति : ‘गर्भ में’ / कुमार लव/ 2015/
  • तक्षशिला प्रकाशन, 98-ए, हिंदी पार्क, 
  • दरियागंज, नई दिल्ली - 110002/ 
  • पृष्ठ – 136/ मूल्य – रु. 300/- 

सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

पुस्तक समीक्षा-'हथेलियों में सूरज' (काव्य संग्रह)-मंजु महिमा





मुझे उड़ना ही होगा..



        'हथेलियों में सूरज' यूँ ही नहीं उग जाता, हथेलियों को इस
काबिल बनाना पड़ता है कि वे सूरज की गर्माहट,ऊर्जा तथा रौशनी को अपने भीतर
समेट सकें! मंजु 'महिमा' एक संवेदनशील कवयित्री है। नारी-सुलभ संकोच,
सहनशीलता, भद्रता ,गंभीरता, करुणा उनके व्यक्तित्व के अंग हैं और उनका
यही व्यक्तित्व उनकी ठहरी हुई सोच को जन्म देकर अनायास मन के भीतर के
कपाट खोलकर पाठक को उनसे बाबस्ता करता है, पाठक कविता के साथ-साथ चलते
हुए निरंतर उनका सानिध्य महसूस करता है।
            हथेलियों में उतरे हुए सूरज का बिंब उनके भीतर की रौशनी और
ऊर्जा है जिसे उन्होंने न जाने कितने-कितने अंधेरों से जूझकर अपने भीतर
समोया है। कवयित्री अपनी भाषा हिन्दी की ज़बरदस्त पक्षधर हैं, हिन्दी को
'तुलसी -क्यारे' के रूप में बिंबित करना उनकी अपनी भाषा के प्रति
आत्मीयता का स्पंदन है जो उनकी रगों में बह रहा है।
          नारी की स्वाभाविक संवेदनशीलता तथा करुणा से ओत-प्रोत मंजु
की कविता चाहे 'मुझे पतंग न बनाओ' हो, ‘चाहे चिड़िया न बनना’, हो या फिर
'माँ !आ अब लौट चलें' हो, सबमें नारी के स्वतन्त्र परन्तु एक ऐसे बंधन की
स्पष्ट छाप प्रदर्शित होती है जो मर्यादित स्वतंत्रता की चाह में भी एक
कोमल बंधन की आशा रखता है।
              'खूब छूट दो उड़ने की
              पर डोर से बांधे रखो अपनी
              तुम्हारे प्यार की डोर से बंधी
              तुम्हारी हथेलियों पर
              चुग्गा चुगने चली आऊँगी ।'

        यह उड़ने की चाह और साथ ही एक ही हथेली पर चुग्गा चुगना उनके
भीतर की कोमल संवेदना को पाठक के समक्ष अनायास ही एक ऐसी चिड़िया के समीप
ला खड़ा करता है जो पिंजरे से निकलकर अनंत अवकाश में अपने पर फैलाती तो है
पर विश्राम करने अपने पिंजरे में स्वेच्छा से अपनेपन के अहसास में लिपटी
लौट आती है। यह 'मुक्त-बंधन' की चाह तथा अपनेपन का गहरा अहसास उनकी
नारी-संवेदना को प्रखर करता है ।
        नारी-जीवन के विभिन्न आयामों को उद्घाटित करती हुई उनकी
कविताएं नारी-ह्रदय के कितने समीप हैं, यह उनकी कविताओं में बहुत स्पष्ट
है, ये अंतर को एक पावस अहसास से भर देती हैं। नारी के स्वतन्त्र
व्यक्तित्व की पक्षधर मंजु महिमा अपनी सीमाओं में रहकर अपने अधिकार के
लिए चुनौती देती दृष्टव्य होती हैं, कहती हैं ----
            'मुझे उड़ना ही होगा ,
            मैं बिना उड़े नहीं रह सकती
            मुझे देखना ही होगा
            मैं अनदेखा नहीं कर सकती ।'

        शिद्द्त के साथ अपनी इस भावना को सरेआम न केवल रखना  वरन  उस पर
जमकर पांव रखना तथा दृढ़ता से चलना उनकी श्रेष्ठ कविता से पूर्व उनकी एक
संवेदनशील श्रेष्ठ नारी के सम्मान को गौरवान्वित करते हैं ।
          मंजु की यह कोमल स्त्रीयोचित करुणा उनकी रचना 'माँ! अब लौट
चलें' में स्त्री की करुणा, आज के युग में भी बेचारगी की साक्षी बनकर
पाठक के समक्ष आ उपस्थित होती है। ''माँ अब लौट चलें' में उनके मन की गहराई में उतरी पीड़ा
कितने स्प्ष्ट शब्दों में मुखरित हुई है ----
            जहाँ तुम्हें सदैव
            औरत होने का कर्ज़ चुकाना पड़ता है ।
            और  इससे भी अधिक..
            तुम एक भोग्या हो,
            खर्चे की पुड़िया
            जब तुम पैदा हुईं थीं,
            तब थाली नहीं बजी थी...(कितनी गहन पीड़ा !!)
            तुम्हारे होने की खबर
            शोक-सभा में तब्दील हो गई थी...
            (सदियों से चला आ रहा शाश्वत सत्य )

        भीतर से पीड़ित, स्त्री के नैसर्गिक अहसास के सम्मान को महसूसते
हुए मंजु कभी भी कमज़ोर अथवा बेचारगी का जामा पहनकर करुणा तथा दया की
याचना नहीं करती दिखाई देतीं । वे अपने व्यक्तित्व के लिए हर पल एक खामोश
युद्ध के लिए तत्पर रही हैं इसीलिए वे अपने बच्चों की ढाल बनकर उनके
व्यक्तित्व को पुचकारती हुई उन्हें विमर्श देती हैं ----
            चिड़िया बनना मेरी नियति थी
            पर,मेरे बच्चों !
            तुम कभी ‘चिड़िया’ न बनना !

  साथ ही वे माँ को कितनी शिद्द्त से, साहस से भरोसा देती हुई दिखाई देती हैं ---
            माँ ! डरो  नहीं, मैं उतनी कमज़ोर नहीं ।
            जो दुनिया का सामना नहीं कर पाऊँगी ।

          मंजु जी की रचनाओं में मुझे वे सदैव एक कैनवास पर लिखे गए एक
चित्र की भांति प्रतीत हुई हैं जिनमें उनके प्रतबिंबित होने का अहसास हर
पल बना रहता है । 'प्रकृति के सानिध्य में' नैनीताल के चार प्रहरों को उन्होंने
जिस प्रकार से समय को  विभाजित किया है,वह उनकी स्त्री के प्रति एक गहरी
तथा कोमल अनुभूति का प्रतीक लगता है..
नैनीताल की झील उन्हें प्रात:काल में..अल्हड कन्या
मध्यान्ह में..सुघड़ गृहिणी 

संध्या में..भाल पर सिंदूरी टीका लगाए आतिथ्य करती प्रसन्नवदन सधवा 
रात्रि में..दुल्हन सी संवरी स्वयं पर मोहित समर्पण की आतुरता लिए 

कोमलांगी प्रतीत होती है ।


          जीवन के विभिन्न आयामों को सहेजे उनकी कविताएं चाहे इस संग्रह
में हों या न हों मुझे सदा उनकी पारदर्शिता एक झीना अहसास दिलाती हैं।
यही पारदर्शिता मैंने मंजु के व्यक्तित्व में सदा से पाई है जो उन्हें
एक अच्छी कवयित्री से भी पूर्व एक अच्छे संस्कारी इंसान के रूप में
उद्घाटित करती है । मेरे मन में, जीवन में कुछ भी अच्छा बनने से पूर्व एक
अच्छे इंसान होने का मोल बहुत ऊँचा है। मन के भीतर अपने शब्दों के
माध्यम से उतर जाने वाली यह कवयित्री अपने पारदर्शी स्नेहिल व्यक्तित्व
से भी सबको सदा जीतती आई है।
          हमारे हज़ारों सलाम
          हैं उनके नाम
          जो चलते नहीं..किसी के बनाए रास्तों पर
          बनाते हैं स्वयं अपनी राह
          और..छोड़ जाते हैं एक छाप
          दिलों की ज़मीन पर..
                    ( प्रणव भारती )

    स्वागत है 'हथेलियों पर उगते हुए सूरज' का जो हमें भी एक नयी ऊर्जा तथा दिशा देगा मंजु महिमा
के साहित्यिक गौरवपूर्ण कदम का स्वागत है। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि  इस पुस्तक में संगृहित उनकी कविताएं पाठक को उनके अहसासों से जुड़ने के लिए बाध्य कर देंगी..आमीन !
     
  • पुस्तक-.'हथेलियों में सूरज' (काव्य संग्रह)
  • रचनाकार-मंजु महिमा
  • प्रकाशक-नव्या प्रकाशन, सुरेन्द्र नगर, गुजरात.

डॉ.प्रणव भारती


(कथाकार एवं गीतकार),
पूर्व फेकल्टी,
एन.आई.डी एवं फिल्म इंस्टिट्यूट,
अहमदाबाद (गुजरात)