सोमवार, 11 अप्रैल 2016

पुस्तक समीक्षा: ‘सरहदें’-कवि कलम की चाह लेकर सर हदें-आचार्य संजीव सलिल




मूल्यों के अवमूल्यन, नैतिकता के क्षरण तथा संबंधों के हनन को दिनानुदिन सशक्त करती तथाकथित आधुनिक जीवनशैली विसंगतियों और विडंबनाओं के पिंजरे में आदमी को दम तोड़ने के लिये विवश कर रही है। कवि-पत्रकार सुबोध श्रीवास्तव की कविताएँ बौद्धिक विलास नहीं, पारिस्थितिक जड़ता की चट्टान को तोड़ने में जुटी छेनी की तरह हैं। आम आदमी अविश्वास और निजता की हदों में कैद होकर घुट रहा है। सुबोध जी की कविताएँ ऐसी हदों को सर करने की कोशिश से उपजी हैं। कवि सुबोध का पत्रकांर उन्हें वायवी कल्पनाओं से दूरकर जमीनी सामाजिकता से जोड़ता है। उनकी कविताएँ अनुभूत की सहज-सरल अभिव्यक्ति करती हैं। वर्तमान नकारात्मक पत्रकारिता के समय में एक पत्रकांर को उसका कवि आशावादी बनाता है।

सब कुछ खत्म/ नहीं होता
सब कुछ/ खत्म हो जाने के बाद भी
बाकी रह जाता है/कहीं कुछ
फिर सृजन को।
हाँ, एक कतरा उम्मीद भी/ खड़ी कर सकती है
हौसले और विश्वास की/ बुलंद इमारत।

अपने नाम के अनुरूप् सुबोध ने कविताओं को सहज बोधगम्य रखा है। वे आतंक के सरपरस्तों को न तो मच्छर के दहाडने की तरह नकली चुनौती देते हैं, न उनके भय से नतमस्तक होते हैं अपितु उनकी साक्षात शान्ति की शक्ति और हिंसा की निस्सारिता से कराते हैं-

तुम्हें/ भले ही भाती हो
अपने खेतों में खड़ी/ बंदूकों की फसल
लेकिन-/ मुझे आनंदित करती है
पीली-पीली सरसों/ और/दूर तक लहलहाती
गेहूं की बालियों से उपजता/ संगीत।
तुम्हारे बच्चों को/ शायद
लोरियों सा सुख भी देती होगी
गोलियों की तड़तड़ाहट/ लेकिन/सुनो
कभी खाली पेट नहीं भरा करती
बंदूकें/सिर्फ कोख उजाड़ती हैं।

सुबोध की कविताएँ आलंकारिकता का बहिष्कार नहीं करतीं, नकारती भी नहीं पर सुरुचिपूर्ण तरीके कथ्य और भाषा की आवश्यकता के संप्रेषण को अधिक प्रभावी बनाने के लिये उपकरण की तरह अनुरूप उपयोग करती हैं।

उसके बाद/ फिर कभी नहीं मिले/ हम-तुम
लेकिन/ मेरी जिन्दगी को/ महका रही है
अब तक/ खुशबू/तेरी याद की
क्योकि/ यहाँ नहीं है/ कोई सरहद।

‘अहसास’ शीर्षक अनुभाग में संकलित प्रेमपरक रचनाएँ लिजलिजेपन से मुक्त और यथार्थ के समीप हैं।

आँगन में/जरा सी धूप खिली
मुंडेर पे बैठी/ चिडि़या ने/फुदककर
पंखों में छिपा मुंह /बाहर निकाला
और/चहचहाई/तो यूं लगा/कि तुम आ गये।

कवि मानव मन की गहराई से पड़ताल कर, कड़वे सच को भी सहजता और अपनेपन से कह पाता है-

जितना/खौफनाक लगता है/सन्नाटा
उससे भी कहीं ज्यादा/डर पैदा करता है
कोई/खामोश आदमी।
दोनों ही स्थितियां /तकरीबन एक सी हैं
फर्क सिर्फ इतना है कि/सन्नाटा/टूटता है तो
फिर पहले जैसा हो जाता है/माहौल/लेकिन
चुप्पी टूटने पे/ अक्सर/बदला-बदला सा
नज़र आता है/ आदमी।

संग्रह के आकर्षण में डॉ रेखा निगम, अजामिल तथा अशोक शुक्ल ‘अंकुश’ के चित्रों ने वृद्धि की है। प्रतिष्ठित कलमकार दिविक रमेश जी की भूमिका सोने में सुहागे की तरह है।

  • सरहदें (कविता संग्रह)-सुबोध श्रीवास्तव/ ISBN 978-93-83969-72-2 / प्रथम संस्करण-2016 / मूल्य 120 रु.
  • प्रकाशक-अंजुमन प्रकाशन, 942 आर्य कन्या चैराहा, मुटठीगंज, इलाहाबाद 211003,फ़ोन-+91-9453004398
  • कवि संपर्क- 'मॉडर्न विला', 10/518, खलासी लाइंस, कानपुर (उ.प्र.)-208001, फ़ोन-+91-9305540745


समीक्षक: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 


'समन्वयम' 204, विजय अपार्टमेंट,
नेपियर टाउन, जबलपुर-482001
मो. 09425183244
ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (16-04-2016) को अति राजनीति वर्जयेत् (चर्चा अंक-2314) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. हार्दिक धन्यवाद मयंक जी स्नेह के लिए..

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  2. उत्तर
    1. तहे दिल से शुक्रिया ओंकार जी..

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