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सोमवार, 23 नवंबर 2015

अशोक अंजुम की ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


(एक)


खाना- पीना, हंसी-ठिठोली , सारा कारोबार अलग !
जाने क्या-क्या कर देती है आँगन की दीवार  अलग !

पहले इक छत के ही नीचे  कितने उत्सव होते थे,

सारी खुशियाँ पता न था यूँ कर देगा बाज़ार  अलग !

पत्नी, बहन, भाभियाँ, ताई, चाची, बुआ, मौसीजी

सारे रिश्ते एक तरफ हैं लेकिन माँ का प्यार  अलग !

कैसे तेरे - मेरे रिश्ते को मंजिल मिल सकती थी

कुछ तेरी रफ़्तार अलग थी, कुछ मेरी रफ़्तार अलग !

जाने कितनी देर तलक दिल बदहवास-सा रहता है

तेरे सब इकरार अलग हैं, लेकिन इक इनकार  अलग !

अब पलटेंगे,  अब पलटेंगे, जब-जब ऐसा सोचा है

'अंजुम जी' अपना अन्दाज़ा हो जाता हर बार  अलग !


(दो) 


झिलमिल-झिलमिल जादू-टोना पारा-पारा आँख में है
बाहर कैसे धूप खिलेगी जो अँधियारा आँख में है

यहाँ-वहाँ हर ओर जहाँ में दिलकश खूब नज़ारे हैं

कहाँ जगह है किसी और को कोई प्यारा आँख में है

एक समन्दर मन के अन्दर उनके भी और मेरे भी

मंज़िल नहीं असंभव यारो अगर किनारा आँख में है

परवत-परवत, नदिया-नदिया, उड़ते पंछी, खिलते फूल

बाहर कहाँ ढूँढते हो तुम हर इक नज़ारा आँख में है

चैन कहाँ है, भटक रहे हैं कभी इधर तो कभी उधर

पाँव नहीं थमते हैं ‘अंजुम’ इक बंजारा आँख में है


(तीन)


बड़ी मासूमियत से सादगी से बात करता है
मेरा किरदार जब भी ज़िंदगी से बात करता है

बताया है किसी ने जल्द ही ये सूख जाएगी

तभी से मन मेरा घण्टों नदी से बात करता है

कभी जो तीरगी मन को हमारे घेर लेती है

तो उठ के हौसला तब रौशनी से बात करता है

नसीहत देर तक देती है माँ उसको ज़माने की

कोई बच्चा कभी जो अजनबी से बात करता है

मैं कोशिश तो बहुत करता हूँ उसको जान लूँ लेकिन

वो मिलने पर बड़ी कारीगरी से बात करता है

शरारत देखती है शक्ल बचपन की उदासी से

ये बचपन जब कभी संजीदगी से बात करता है


(चार)


सबको चुभती रही मेरी आवारगी
मुझमें सबसे भली मेरी आवारगी

रंग सारे सजाकर विधाता ने तब

रफ़्ता-रफ़्ता रची मेरी आवारगी

वक़्त ने यूँ तो मुझसे बहुत कुछ लिया

जाने क्यों छोड़ दी मेरी आवारगी

ज़ुल्मतें-जु़ल्मतं हर तरफ ज़ुल्मतें

चाँदनी-चाँदनी मेरी आवारगी

ज़िन्दगी की डगर में जो काँटे चुभे

बन गई मखमली मेरी आवारगी

हादसों ने कसर कोई छोड़ी नहीं

मेरी रहबर बनी मेरी आवारगी

धूप में, धुन्ध में, तेज बरसात में

कब थमी, कब रुकी मेरी आवारगी


(पांच) 


कोई राजा नहीं, कोई रानी नहीं
ये कहानी भी कोई कहानी नहीं

आम जनता के सपनों का मक़तल है ये

दोस्तो ये कोई राजधानी नहीं

ये जो ख़ैरात है इसको रह ने ही दो

हमको हक़ चाहिए मेहरबानी नहीं

अश्क हों आह हों जिसमें मज़लूम की

ऐसी दौलत हमें तो कमानी नहीं

कंकरीटों की फसलें उगीं चारसू

रंग धरती का पहले सा धानी नहीं

जिनमें हो न ज़रा भी जिगर का लहू

ऐसे  शेरों के कोई भी मानी नहीं

एक बेदम नदी पूछती है मुझे

तेरी आँखों में क्यूँ आज पानी नहीं

डूबना लाज़मी था तेरी नाव का

बात पतवार की तूने मानी नहीं


(छह) 


ये सारा आलम महक रहा है, चला ये किसके हुनर का जादू
कि रफ़्ता-रफ़्ता शबाब पर है, किसी की खिलती उमर का जादू

मैं कौन हूँ, कुछ पता नहीं है, कि होश  मेरे उड़े हुए हैं

चलाया किसने ये मुस्कुराकर यूँ अपनी तिरछी नज़र का जादू

धरा जले है, गगन जले है, सुलग रहा है समूचा आलम

कि ऐसे में भी बिखर रहा है ये खूब इक गुलमुहर का जादू

ये मन में हलचल-सी हो रही है, खनक रहे हैं किसी के कंगन

नशे में मुझको डुबोता जाये वो कँपकँपाते अधर का जादू


अशोक अंजुम 


संपादक : अभिनव प्रयास ( त्रेमासिक )
स्ट्रीट २, चन्द्र विहार कॉलोनी (नगला डालचंद),
क्वार्सी बाई पास,अलीगढ 202001 (उ -प्र.)
मो. ०९२५८७७९७४४,०९३५८२१८९०७




अशोक ‘अंजुम’

(अशोक कुमार शर्मा)


  • जन्मदिन- 15 दिसम्बर 1966 (माँ ने बताया), 
  • 25 सितम्बर 1966 (काग़ज़ों पर)
  • काग़ज़ी शिक्षा - बी.एससी.,एम.ए.(अर्थशास्त्र, हिन्दी),बी.एड.
  • लेखन-विधाएँ - मुख्यतया गज़ल, दोहा, गीत, हास्य-व्यंग्य,साथ ही लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, लेख, समीक्षा, भूमिका, साक्षात्कार, नाटक आदि
  • प्रकाशित पुस्तके-
  • 1. भानुमति का पिटारा (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) / 2.खुल्लम खुल्ला (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) / 3.मेरी प्रिय ग़ज़लें (ग़ज़ल संग्रह) पुरस्कृत /4.मुस्कानें हैं ऊपर-ऊपर (ग़ज़ल संग्रह) पुरस्कृत / 5.दुग्गी, चैके, छक्के (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) / 6.अशोक अंजुम की प्रतिनिधि ग़ज़लें /7.तुम्हारे लिए ग़ज़ल (ग़ज़ल संग्रह) / 8.एक नदी प्यासी (गीत संग्रह) पुरस्कृत/ 9. जाल के अन्दर जाल मियाँ (व्यंग्य ग़ज़लें) पुरस्कृत/10. क्या करें कन्ट्रोल नहीं होता (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /11 . प्रिया तुम्हारा गाँव (दोहा-संग्रह) पुरस्कृत/ 12. यमराज आॅन अर्थ (नाटक संग्रह)/13. पढ़ना है (नाटक )/14. चम्बल में सत्संग(दोहा-संग्रह)/ 15.यूँ ही...(ग़ज़ल संग्रह) 
  • सम्पादित पुस्तकें:-
  • 1.श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य कविताएँ (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /2.अंजुरी भर ग़ज़लें (ग़ज़ल संकलन)/3.हास्य-व्यंग्य में डूबे, 136 अजूबे (हास्य-व्यंग्य कविताएँ)/4. हास्य भी, व्यंग्य भी (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /5. ग़ज़ल से ग़ज़ल तक (ग़ज़ल संग्रह) /6. रंगारंग हास्य कवि सम्मेलन (हास्य-व्यंग्य)/7. आह भी वाह भी (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /8. लोकप्रिय हास्य-व्यंग्य कविताएँ (हास्य-व्यंग्य कविता संक.) /9. लोकप्रिय हिन्दी ग़ज़लें (ग़ज़ल संकलन)/10. दोहे समकालीन (दोहा संकलन) /11. रंगारंग दोहे (दोहा संकलन) /12. दोहा दशक (दोहा संकलन) /13. दोहा दशक-2(दोहा संकलन) /14. दोहा दशक-3 (दोहा संकलन)/15. हँसता खिलखिलाता हास्य कवि सम्मेलन (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /16. व्यंग्य भरे कटाक्ष (व्यंग्य लघुकथाएँ) /17. हँसो बत्तीसी फाड़ के (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /18. नई सदी के प्रतिनिधि ग़ज़लकार (ग़ज़ल संकलन) /19. हँसी के रंग कवियों के संग (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /20.ग़ज़लें रंगबिरंगी (हास्य-व्यंग्य ग़ज़ल संग्रह) /21. व्यंग्य कथाओं का संसार (व्यंग्य लघुकथाएँ) /22. नीरज के प्रेम गीत (गीत संग्रह) /23. नई सदी के प्रतिनिधि दोहाकार (दोहा संकलन) /24.श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य गीत (गीत संकलन) /25. हास्य एवं व्यंग्य ग़ज़लें (हास्य व्यंग्य ग़ज़ल संकलन)/26.नए युग के बीरबल (व्यंग्य लघुकथाएँ)/27. हास्य कवि दंगल (हास्य व्यंग्य कविताएँ)/28. हिंदी के लोकप्रिय ग़ज़लकार (पद्मभूषण नीरज के साथ संपादित)/ 29.नए दौर की ग़ज़लें (ग़ज़ल संग्रह)/30.आनन्द आ गया (आनन्द गौतम की व्यंग्य कविताओं का संपादन)/31.आधुनिक कवयित्रियाँ (काव्य संकलन)/32.आधुनिक लोकप्रिय दोहाकार (दोहा संकलन) /33. शेर ग़ज़ब के ( अश्आर संकलन)
  • अशोक अंजुम: व्यक्ति एवं अभिव्यक्ति ( श्री जितेन्द्र जौहर द्वारा संपादित ) 
  • सम्पादक - अभिनव प्रयास (कविता को समर्पित त्रैमा.) 
  • सलाहकार सम्पादक- हमारी धरती (पर्यावरण द्वैमासिक)
  • अतिथि संपा -1. प्रताप शोभा (त्रैमा.) (सुल्तानपुर) का दोहा विशेषाक/ 2. खिलखिलाहट (अनि.) (सुतानपुर) का हास्य-व्यंग्य ग़ज़ल विषेशांक/ 3.सरस्वती सुमन (त्रैमा0) देहरादून का दोहा विशेषांक/ 4. हमारी धरती (द्वै0मा0) के दो जल विशेषांक तथा एक प्राकृतिक आपदा विशेषांक का अतिथि संपादन
  • अध्यक्ष-दृष्टि नाट्य मंच , अलीगढ़ / सचिव - संवेदना साहित्य मंच, अलीगढ़/पूर्व सचिव- हरीतिमा पर्यावरण सुरक्षा मंच, अलीगढ़/ सदस्य- बोर्ड आॅफ एडवाइजर्स-1999(अमेरिकन बायोग्राफिक्स इंस्टी. अमेरिका) 
  • सम्मानोपधियाँ- विशिष्ट नागरिक, राष्ट्र भाषा गौरव, हास्य-व्यंग्य अवतार, श्रेष्ठ कवि, लेखकश्री, काव्यश्री, साहित्यश्री, समाज रत्न, हास्यावतार, मेन आफ द इयर, साहित्य शिरोमणि......आदि दर्जनों सम्मानोपाधियाँ 
  • पंकज उधास (चर्चित गायक), श्री साहब सिंह वर्मा (तत्कालीन मुख्यमंत्री ),ज्ञानी जैलसिंह (भू.पू.राष्ट्र पति) श्री मुलायम सिंह यादव (त.मुख्यमंत्री, उ.प्र.), सांसद शीला गौतम (अलीगढ़),श्री आई.एस.पर्सवाल (महाप्रबंधक एन.टी.पी.सी. दादरी), श्री कन्हैयालाल सर्राफ(चर्चित उद्योगपति, मुम्बई), महामहिम के.एम.सेठ.(राज्यपाल छ.ग.),श्री रवेन्द्र पाठक (महापौर,कानपुर ) लेफ्टि.कर्नल श्री एस.एन.सिन्हा (पूर्व राज्यपाल असाम, जम्मू-कश्मीर) श्री टी. वेंकटेश ( कमिश्नर , अलीगढ ) इत्यादि गणमान्य हस्तियों द्वारा विशिष्ट समारोहों में सम्मानित।
  • पुरस्कार-श्रीमती मुलादेवी काव्य-पुरस्कार (भारत भारती साहित्य संस्थान) द्वारा ‘मेरी प्रिय ग़ज़लें’ पुस्तक पर 1995/- स्व. रुदौलवी पुरस्कार (मित्र संगम पत्रिका, दिल्ली) /-दुश्यंत कुमार स्मृति सम्मान-1999 (युवा साहित्य मंडल, गाज़ियाबाद )-सरस्वती अरोड़ा स्मृति काव्य पुरस्कार-2000 (भारत-एषिआई साहित्य अका., दिल्ली )/- डाॅ0 परमेश्वर गोयल व्यंग्य षिखर सम्मान-2001 ( अखिल भारतीय साहित्य कला मंच , मुरादाबाद )/-रज़ा हैदरी ग़ज़ल सम्मान-2005 ( सृजनमंच, रायपुर (छ.ग.)/- साहित्यश्री पुरस्कार-2009, डाॅ.राकेशगुप्त, ग्रन्थायन प्रकाशन, अलीगढ़/- स्व. प्रभात शंकर स्मृति सम्मान-2010, नमन प्रकाशन तथा माध्यम संस्था, लखनऊ/- विशाल सहाय स्मृति सम्मान-2010, मानस संगम, कानपुर/- मालती देवी-विलसन प्रसाद सम्मान-2010,अतरौली /.फणीश्वरनाथ रेएाु स्मृति सम्मान-2011, वाग्वैचित्र्य मंच,अररिया (बिहार)से ‘जाल के अन्दर जाल मियाँ’ पुस्तक पर/- राष्ट्रधर्म गौरव सम्मान -2012, राष्ट्रधर्म प्रकाशन, लखनऊ,‘प्रिया तुम्हारा गाँव’ पुस्तक पर/-सेवक स्मृति सम्मान-2012, साहित्यिक संघ, वाराणसी /-हिन्दी सेवी सम्मान-2013, हिन्दी साहित्य विकास परिषद्, धनबाद (झारखण्ड)/- दुश्यंत स्मृति सम्मान-2013 एअन्तर्राष्ट्रीय साहित्य कला मंच, मेरठ/स्व.सरस्वती सिंह हिन्दी विभूति सम्मान-2013,कादम्बरी, जबलपुर/नीरज पुरस्कार-2014ए (1 लाख 1 हज़ार रुपए) अलीगढ़ कृषि प्रदार्शनी द्वारा
  • अन्य. अलीगढ़ एंथम के रचयिता - अनेक गायकों द्वारा ग़ज़ल, गीत गायन/विभिन्न नाटकों में अभिनय व गीत तथा स्क्रिप्ट लेखन/कवि सम्मेलनों में हास्य-व्यंग्य तथा गीत, ग़ज़ल, दोहों के लिए चर्चित / संयोजन व संचालन भी/- दूरदर्षन के राष्ट्रीय प्रसारण के साथ ही सब टी.वी,एन.डी टी.वी, ई.टी.वी, लाइव इण्डिया,तरंग चैनल आदि अनेक चैनल्स के साथ ही आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से प्रसारण/ ई.टी.वी के एक लोकप्रिय हास्य कार्यक्रम में जज/ अनेक षोध ग्रन्थों में प्रमुखता से उल्लेख/सैकड़ों समवेत संकलनों में तथा देष की अधिकांष चर्चित पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में सैकड़ों रचनाएँ प्रकाशित/विभिन्न रेखांकन पुस्तकों व पत्रिकाओं के आवरण पर प्रकाशित
  • सम्प्रति-सन्त पिफदेलिस स्कूल, ताला नगरी, रामघाट रोड, अलीगढ़ -202001 
  • सम्पर्क-गली.2,चंद्रविहार कालोनी;नगला डालचन्द, क्वारसी बाईपास, अलीगढ़-202 001 ,
  • मोबाइल नं.- 09258779744/ 09358218907
  • ईमेल : ashokanjumaligarh@gmail.com 
  • ब्लॉग : ashokanjum.blogspot.in

सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

कृष्णानंद चौबे की ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


अपने मुक़द्दर में नहीं..


मंदिरों में आप मन चाहे भजन गाया करें,
मैकदा ये है यहाँ तहज़ीब से आया करें


रात की ये रौनकें अपने मुक़द्दर में नहीं,
शाम होते ही हम अपने घर चले आया करें


साथ जब देता नहीं साया अँधेरे में कभी,
रौशनी में ऐसी शय से क्यूँ न घबराया करें


बन्द रहते हैं जो अक्सर आम लोगो के लिये,
अपने घर में ऐसे दरवाज़े न लगवाया करें


ये हिदायत एक दिन आयेगी हर स्कूल में,
मुल्क की तस्वीर बच्चों को न दिखलाया करें


क्यूँ नहीं आता है इन तूफ़ानी लहरों को शऊर,
कम से कम कागज़ की नावों से न टकराया करें


सफ़र डूब रहा है..


दुनिया की ले के खैर-ख़बर डूब रहा है,
तय कर लिया सूरज ने सफ़र डूब रहा है


हम मंदिरों-मस्जिद को बचाने में लगे हैं,
घर की है नहीं फ़िक्र के घर डूब रहा है


मँझधार में नेता जो दिखा, लोग ये बोले,
अच्छा है अजी डूबे अगर डूब रहा है


उस डूबने वाले के मुक़द्दर को कहें क्या,
तिनके का सहारा है मगर डूब रहा है


तस्वीर बनाते हैं जो कपड़ों के बिना ही,
उन काँपते हाथों से हुनर डूब रहा है


ख़ुशी भी नहीं..


हमारे चेहरे पे ग़म भी नहीं ख़ुशी भी नहीं,
अँधेरा पूरा नहीं पूरी रौशनी भी नहीं।


है दुश्मनों से कोई ख़ास दुश्मनी भी नहीं,
जो दोस्त अपने हैं उनसे कभी बनी भी नहीं।


मैं कैसे तोड़ दूँ दुनिया से सारे रिश्तों को,
अभी तो पूरी तरह उससे लौ लगी भी नहीं।


अजीब रुख़ से वो बातों को मोड़ देता है
कि जैसे बात ग़लत भी नहीं, सही भी नहीं


तुम्हारे पास हक़ीक़त में इक समन्दर है,
हमारे ख्व़ाब में छोटी-सी इक नदी भी नहीं।


कोई बताये ख़ुशी किसके साथ रहती है,
हमें तो एक ज़माने से वो दिखी भी नहीं।


लो फिर से आ गये बस्ती को फूँकने के लिये,
अभी तो पहले लगाई हुई बुझी भी नहीं।


अजीब बात है दीपावली के अवसर पर
करोड़ो बच्चों के हाथों में फुलझड़ी भी नहीं।


तुम्हारा नाम आया रात भर..


पूछिये मत क्यों नहीं आराम आया रात भर,
उनके आने का ख़याले-ख़ाम आया रात भर।


और लोगो की कहानी सुन के मैं करता भी क्या,
मेरा अफ़साना ही मेरे काम आया रात भर।


याद करने को ज़माने भर के ग़म भी कम न थे,
भूलने को बस तुम्हारा नाम आया रात भर।


मयकदे से तश्नालब लौटे थे शायद इसलिये
ख्व़ाब में रह-रह के ख़ाली जाम आया रात भर।


देखना है अब कहाँ रह पायेगी तौबा मेरी,
मेरे ख़्वाबों में उमरख़य्याम आया रात भर।


वक़्त कम है काम काफ़ी दोस्तो कुछ तो करो,
उम्र के ख़ेमे से ये पैग़ाम आया रात भर।


ख़ुद पर तो एतबार आये..


क्या ये मुमकिन नहीं भार आये,
और आये तो बार-बार आये।


आप पर एतबार कर तो लूँ,
पहले ख़ुद पर तो एतबार आये।


जिसने मुझको दिये थे ग़म ही ग़म,
अपनी ख़ुशियाँ उसी पे वार आये।


चार दिन की ये ज़िन्दगी का लिबास,
कुछ ने पहना है, कुछ उतार आये।


बेवफ़ा होंगे वो किसी के लिये,
मुझसे मिलने तो बार-बार आये।


ख्व़ाब को ख्व़ाब की तरह देखो,
फूल आये ये उसमे ख़ार आये।



पं. कृष्णानंद चौबे


  • जन्म : 5 अगस्त 1913 (फर्रुखाबाद)
  • निधन : 14 मार्च 2010 (कानपुर)
  • शिक्षा : स्नातक
  • जीवन : सन् 1953 से 1960 तक बनारस से प्रकाशित ‘अमृत पत्रिका’ दैनिक में उप-सम्पादक। सन् 1961 से 1980 तक उद्योग निदेशालय (उ.प्र.) कानपुर में ‘इंडस्ट्रीज़ न्यूज़ लेटर’ का सम्पादन। सन् 1990 में सेवानिवृत होने के उपरान्त जीवनपर्यंत दैनिक जागरण, कानपुर से सम्बद्ध रहे।
  • विशेष : साहित्य की विविध विधाओं यथा गीत, ग़ज़ल, हास्य-व्यंग्य, आलेख. समीक्षा एवं पत्रकारिता में निरंतर सृजनरत रहे।

सोमवार, 21 सितंबर 2015

अंसार क़म्बरी की ग़ज़लें



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



ज़िन्दा रहे तो हमको..


ज़िन्दा रहे तो हमको क़लन्दर कहा गया.
सूली पे चढ़ गये तो पयम्बर कहा गया 

ऐसा हमारे दौर में अक्सर कहा गया.
पत्थर को मोम, मोम को पत्थर कहा गया 

खुद अपनी पीठ ठोंक ली कुछ मिल गया अगर
जब कुछ नहीं मिला तो मुक़द्दर कहा गया 

वैसे तो ये भी आम मकानों की तरह था.
तुम साथ हो लिये तो इसे घर कहा गया 

जिस रोज़ तेरी आँख ज़रा डबडबा गयी.
क़तरे को उसी दिन से समन्दर कहा गया 

जो रात छोड़ दिन में भी करता है रहज़नी.
ऐसे सफेद पोश को रहबर कहा गया 



तेरा आँचल जो..


तेरा आँचल जो ढल गया होता,
रुख़ हवा का बदल गया होता 

देख लेता जो तेरी एक झलक,
चाँद का दम निकल गया होता 

छू न पायी तेरा बदन वरना,
धूप का हाथ जल गया होता 

झील पर ख़ुद ही आ गए वरना,
तुझको लेने कमल गया होता 

मैं जो पीता शराब आँखों से,
गिरते-गिरते सँभल गया होता 

माँगते क्यूँ वो आईना मुझसे,
मैं जो लेकर ग़ज़ल गया होता 



हम कहाँ आ गये..


हम कहाँ आ गये आशियाँ छोड़कर,
खिलखिलाती हुई बस्तियां छोड़कर 

उम्र की एक मंजिल में हम रुक गये,
बचपना बढ़ गया उँगलियाँ छोड़कर 

नाख़ुदा ख़ुद ही आपस में लड़ने लगे,
लोग जायें कहाँ कश्तियाँ छोड़कर 

आज अख़बार में फिर पढ़ोगे वही,
कल जो सूरज गया सुर्ख़ियाँ छोड़कर 

लाख रोका गया पर चला ही गया,
वक़्त यादों की परछाईयाँ छोड़कर 



बह रही है जहाँ पर नदी..


बह रही है जहाँ पर नदी आजकल,
जाने क्यूँ है वहीं तश्नगी आजकल 

अपने काँधे पे अपनी सलीबे लिये,
फिर रहा है हर एक आदमी आजकल 

बोझ काँधों पे है, ख़ार राहों में हैं,
आदमी की ये है ज़िन्दगी आजकल 

पाँव दिन में जलें, रात में दिल जले,
घूप से तेज़ है  चाँदनी आजकल 

एक तुम ही नहीं हो मेरे पास बस,
और कोई नहीं है कमी आजकल 

अपना चेहरा दिखाये किसे ‘क़म्बरी’,
आईना भी लगे अजनबी आजकल 



कोई खिलता गुलाब क्या जाने..


कोई खिलता गुलाब क्या जाने,
आ गया कब शबाब क्या जाने 

गर्मिये-हुस्न की लताफ़त को,
तेरे रुख़ का नक़ाब क्या जाने 

इस क़दर मैं नशे में डूबा हूँ,
जामो-मीना शराब क्या जाने1

लोग जीते हैं कैसे बस्ती में,
इस शहर का  नवाब क्या जाने 

ए.सी. कमरों में बैठने वाले,
गर्मिए-आफ़ताब क्या जाने 

नींद में ख़्वाब देखने वाले,
जागी आँखों के ख़्वाब क्या जाने 

जिसको अल्लाह पर यकीन नहीं,
वो सवाबो-अज़ाब क्या जाने 


अंसार क़म्बरी


 ‘ज़फ़र मंजिल’ 11/116, 
ग्वालटोली, कानपुर–208001
मो-9450938629/ 9305757691


अंसार क़म्बरी



  • जन्म : 3–11–1950
  • पिता का नाम : स्व.ज़व्वार हुसैन रिज़वी
  • लेखन : ग़ज़ल, गीत, दोहा, मुक्तक, नौहा, सलाम, यदा-कदा आलेख एवं पुस्तक समीक्षा आदि
  • प्रकाशित कृति : ‘अंतस का संगीत’ (दोहा व गीत काव्य संग्रह) 
  • सम्मान : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ व्दारा 1996 के सौहार्द पुरस्कार एवं समय-समय पर नगर व देश की अनेकानेक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं व्दारा पुरस्कृत व सम्मानित
  • सम्पर्क : ‘ज़फ़र मंजिल’ 11/116, ग्वालटोली, कानपुर–208001
  • मो - 9450938629/ 9305757691
  • ई-मेल : ansarqumbari@gmail.com

सोमवार, 20 जुलाई 2015

डा. कुंअर बेचैन की ग़ज़लें



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



  • डा. कुँअर बेचैन ग़ज़ल लिखने वालों में ताज़े और सजग रचनाकारों में से हैं। उन्होंने आधुनिक ग़ज़ल को समकालीन जामा पहनाते हुए आम आदमी के दैनिक जीवन से जोड़ा है। यही कारण है कि वे नीरज के बाद मंच पर सराहे जाने वाले कवियों में अग्रगण्य हैं। उन्होंने गीतों में भी इसी परंपरा को कायम रखा है। वे न केवल पढ़े और सुने जाते हैं वरन कैसेटों की दुनिया में भी खूब लोकप्रिय हैं। सात गीत संग्रह, बारह ग़ज़ल संग्रह, दो कविता संग्रह, एक महाकाव्य तथा एक उपन्यास के रचयिता कुँवर बेचैन ने ग़ज़ल का व्याकरण नामक ग़ज़ल की संरचना समझाने वाली एक अति महत्वपूर्ण पुस्तक भी लिखी है। 'काव्ययुग' के पहले अंक में प्रस्तुत हैं उनकी कुछ उम्दा ग़ज़ले..
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(एक)


बड़ा उदास सफ़र है हमारे साथ रहो,
बस एक तुम पे नज़र है हमारे साथ रहो।

हम आज ऐसे किसी ज़िंदगी के मोड़ पे हैं,
न कोई राह न घर है हमारे साथ रहो।

तुम्हें ही छाँव समझकर हम आ गए हैं इधर,
तुम्हारी गोद में सर है हमारे साथ रहो।

ये नाव दिल की अभी डूब ही न जाए कहीं
हरेक सांस भंवर है हमारे साथ रहो।

ज़माना जिसको मुहब्बत का नाम देता रहा,
अभी अजानी डगर है हमारे साथ रहो।

इधर चराग़ धुएँ में घिरे-घिरे हैं 'कुँअर'
उधर ये रात का डर है हमारे साथ रहो।



(दो) 


दिलों में नफरतें हैं अब, मुहब्बतों का क्या हुआ,
जो थीं तेरे ज़मीर की अब उन छतों का क्या हुआ।

बगल में फाइलें लिए कहाँ चले किधर चले,
छुपे थे जो किताब में अब उन खतों का क्या हुआ।

ज़रा ज़रा सी बात पे फफक पड़े या रो पड़े,
वो बात-बात में हँसी की आदतों का क्या हुआ।

लिखे थे अपने हाथ से जो डायरी में आपने,
नई-नई-सी खुशबुओं के उन पतों का क्या हुआ।

कि जिनमें सिर्फ प्यार की हिदायतें थीं ऐ 'कुँअर'
वो मन्त्र सब कहाँ गए उन आयतों का क्या हुआ।



 (तीन) 


फूल को ख़ार बनाने पे तुली है दुनिया,
सबको अंगार बनाने पे तुली है दुनिया।

मैं महकती हुई मिटटी हूँ किसी आँगन की,
मुझको दीवार बनाने पे तुली है दुनिया।

हमने लोहे को गलाकर जो खिलौने ढाले,
उनको हथियार बनाने पे तुली है दुनिया।

जिन पे लफ़्ज़ों की नुमाइश के सिवा कुछ भी नहीं,
उनको फ़नकार बनाने पे तुली है दुनिया।

क्या मुझे ज़ख्म नए दे के अभी जी न भरा,
क्यों मुझे यार बनाने पे तुली है दुनिया।

मैं किसी फूल की पंखुरी पे पड़ी शबनम हूँ,
मुझको अंगार बनाने पे तुली है दुनिया।

नन्हे बच्चों से 'कुँअर ' छीन के भोला बचपन,
उनको हुशियार बनाने पे तुली है दुनिया।



(चार) 


हम कहाँ रुस्वा हुए रुसवाइयों को क्या खबर
डूबकर उबरे न क्यूँ गहराइयों को क्या खबर।

ज़ख्म क्यों गहरे हुए होते रहे होते गए
जिस्म से बिछुड़ी हुई परछाइयों को क्या खबर।

क्यों तड़पती ही रहीं दिल में हमारे बिजलियाँ
क्यों ये दिल बादल बना अंगड़ाइयों को क्या खबर।

कौन सी पागल धुनें पागल बनातीं हैं हमें
होठ से लिपटी हुई शहनाइयों को क्या खबर।

किस क़दर तन्हा हुए हम शहर की इस भीड़ में
यह भटकती भीड़ की तन्हाइयों को क्या खबर।

कब कहाँ घायल हुईं पागल नदी की उंगलियाँ
बर्फ़ में ठहरी हुई ऊँचाइयों को क्या ख़बर।

क्यों पुराना दर्द उठ्ठा है किसी दिल में कुँअर
यह ग़ज़ल गाती हुई पुरवाइयों को क्या खबर।



(पांच) 


हम बहुत रोये किसी त्यौहार से रहकर अलग,
जी सका है कौन अपने प्यार से रहकर अलग।

चाहे कोई हो उसे कुछ तो सहारा चाहिए,
सज सकी तस्वीर कब दीवार से रहकर अलग।

क़त्ल केवल क़त्ल और इसके सिवा कुछ भी नहीं,
आप कुछ तो सोचिये तलवार से रहकर अलग।

हाथ में आते ही बन जाते हैं मूरत प्यार की,
शब्द मिटटी हैं किसी फ़नकाार से रहकर अलग।

वो यही कुछ सोचकर बाज़ार में खुद आ गया,
क़द्र हीरे की है कब बाज़ार से रहकर अलग।

काम करने वाले अपने नाम की भी फ़िक्र कर,
सुर्खियां बेकार हैं अखबार से रहकर अलग।

स्वर्ण-मुद्राएं तुम्हारी भी हथेली चूमतीं,
तुम ग़ज़ल कहते रहे दरबार से रहकर अलग।

सिर्फ वे ही लोग पिछड़े ज़िंदगी की दौड़ में,
वो जो दौड़े वक़्त की रफ़्तार से रहकर अलग।

हो रुकावट सामने तो और ऊंचा उठ 'कुँअर'
सीढ़ियाँ बनतीं नहीं दीवार से रहकर अलग।



 (छह) 


गलियों गलियों सिर्फ घुटन है बंजारा दम तोड़ न दे,
बहरों के घर गाते गाते इकतारा दम तोड़ न दे।

ऊंचे पर्वत से उतरी है प्यास बुझाने धरती की,
अंगारों पर चलते चलते जलधारा दम तोड़ न दे।

चंदा का क्या वह तो अपनी राहें रोज़ बदलता है,
अपने वचनों पर दृढ रहकर ध्रुवतारा दम तोड़ न दे।

मुमकिन हो तो दूर ही रखना दिल की आग को आंसू से,
पानी की बाँहों में आकर अंगारा दम तोड़ न दे।

अंधी आंधी में अब फिर से भेज न मन के पंछी को,
माना पहले बच आया है दोबारा दम तोड़ न दे।

केवल उजियारा रहता तो नींद न मिलती आँखों को,
मेरे बचपन का साथी ये अंधियारा दम तोड़ न दे।

घर घर जाकर बाँट रहा है चिट्ठी जो मुस्कानों की,
देखो मेरे आंसूं का यह हरकारा दम तोड़ न दे।

कितनी मुश्किल से बच पाया आंधी से ये नीड 'कुँअर '
अब तो बिजली की बारिश हैं बेचारा दम तोड़ न दे।