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बुधवार, 5 जुलाई 2017

दिविक रमेश की कविताएं


हरिगोपाल सन्नू 'हर्ष' की कलाकृति


आदमी जो बच गया


आखिर बच्चा ही था वह
(हालाँकि इतना बच्चा भी नहीं था)
जिसने जानना चाहा बिना किसी संदर्भ के
कि कहाँ है लाहॊर?

’पाकिस्तान में?’-एक आसान-सा उत्तर था मेरा।
’ऒर दिल्ली?’
मैंने कहा-भारत में।

सोच लिया, चलो जान छूटी। बच्चा चुप हो गया था।

लेकिन अचानक ही फिर बोल पड़ा वह
मैं हिल गया अचानक हुए बम विस्फोट की तरह।
’भारत ऒर पाकिस्तान कहाँ हैं ?’
’ज़मीन पर! और कहाँ?’ थोड़ा झुँझलाकर कह गया।

’तो ज़मीन वाली बात इतने गुस्से से क्यों बता रहे हैं आप?

उसकी आँखों में मासूमियत थी ऒर वह चला गया।

बहुत देर तक
एक आदमी
मुझमें बचने की कोशिश करता रहा।


आग को जब प्यार कह गया


मैंने कहा प्यार
और उससे उसके अर्थ की जगह आग निकली

मैंने चाहत कहा
और उससे भी अर्थ की जगह आग निकली

मैंने हर वह शब्द जो कहा ऐसे ही
उससे अर्थ की जगह आग ही निकली

ऐसा क्यों हुआ

क्यों बचता रहा आग को आग कहने से
क्यों टालता रहा
भीतर के असल शब्द को
किसी दूसरे शब्द से ?

सोचता हूं
ऐसा क्यों होता है
बहुसंख्यक लोगो !
तुम्हारी तरह बस सोचता हूं।


खोल दो: पुनश्च


‘आंखों में सदियों का जमा दर्द
शरीर बुरी तरह सना सहमती कीचड़ से
भाई तुम कौन हो कहां से पधारे’

हम मंटो की कहानी ‘खोल दो’ हैं:
नाड़ा खुली सलवार से हिन्दू... या शायद मुसलमान... या
क्या फर्क पड़ता है अब कि हम हिन्दू हैं कि मुसलमान

यूं हम गुजरात से हैं।

हम सोचते थे कि वतन वह होता है
जिसमें जन्मता है बंदा एक ही नूर का
कि जिसके लिए जीता और मरता है।

कहां जाना था
कि एक ज़मीन होती है हिन्दू की
कि एक मुसलमान की होती है
एक ही पृथ्वी पर।

हम तो यह भी नहीं जानते थे
कि हिन्दू जनेऊ होता है
कि हिन्दू तिलक होता है
और मुसलमान इंसान से कुछ अलग भी होता है।

सच तो यह है
कि यह भूख तक न हिन्दू है न मुसलमान
और कहां है यह पीड़ा भी
ये औजार यह मेहनत और यह पसीना भी।

कहां जान पाए हैं हम
कब लौट पाएंगें घर
कब लौट पाएंगें
जैसे लौटना चाहिए बंदों को घरों को।

हम मंटो की कहानी ‘खोल दो’ हैं।


सोचूँ


ज़रा सोचूँ
सोचूँ बावजूद डर के
सोचूँ बावजूद डरे हुओं के

सोचूँ 
डर सिपाही में है या हमारी चोरी में
डर मृत्यु में है या जीने की लालसा में
डर डरा रहे राक्षस में है या खुद हममें

सोचूँ
मरता वह है
डर हमें लगता है
गुनाह वह करता है
कांपते हम हैं

सोचूँ
छूट गया डरना
तो क्या होगा डर का

सोचूँ
बारिश में भीगने का डर
क्यों भागता है बारिश में भीगकर

सोचूँ
क्या होता है हव्वा
जिसे न बच्चा जानता है, न हम।

सोचूँ
हम रचते ही क्यों हैं हव्वा?

सोचूँ
एक कहानी है भस्मांकुर
या विजय डर पर।

अच्छा, इतना तो सोच ही लूँ
कि जब पिट्टी कर देते हैं हव्वा की
तो क्यों भाग जाता है
सचमुच
बच्चे की आँखों से हव्वा।
बच्चा बजाता है तालियाँ।

आओ, कभी कभार बिने सोचे
मात्र भगाने की बजाय
कर दें हत्या हव्वा की
क्या हम नहीं चाहते
कि बजाता रहे तालियाँ बच्चा
लगातार...... लगातार.........

सोचूँ
लेकिन !


दहाड़


कह सकते हैं क्या
सांझ से छोड़ने को अपनी कालिमा ?

कह सकते हैं क्या
पेड़ से छोड़ने को अपनी छांह ?

कह सकते हैं क्या आकाश को
कि छोड़ दे अपनी धरती ?

जो भी हो
एक रंग है
मेरे भी चेहरे की पहचान का ।
एक छांह है
मेरी भी
अपने थके हुए दोस्तों के लिए ।
एक धरती भी है -
मेरी सांस -
जाने कितने ही चढ़-उतर रहे हैं
जिसको पकड़े
मेरे अपने, मेरे जन।

मैं नहीं जानता
क्या है आखिरी परिभाषा प्रेम की
नहीं जानता
क्या है आखिरी अर्थ न्यौछावर होने का
बस इतना जरूर जानता हूं
कि जब जब हिलाया है मुझे
युद्ध की दहाड़ ने
मुझे लगा है
जैसे हुक्म दिया गया है सांझ को
अपनी कालिमा छोड़ने का

जैसे हुक्म दिया गया है पेड़ को
अपनी छांह तजने का

जैसे कहा गया है आकाश को
अपनी धरती छोड़ने को ।


दिविक रमेश



  • वास्तविक नाम - रमेश शर्मा
  • जन्म :  १९४६, गाँव किराड़ी, दिल्ली।
  • शिक्षा :  एम.ए. (हिन्दी), पी-एच.डी. (दिल्ली विश्वविद्यालय)
  • पुरस्कार/सम्मान : गिरिजाकुमार माथुर स्मृति पुरस्कार, १९९७
  • सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, १९८४
  • दिल्ली हिन्दी अकादमी का साहित्यिक कृति पुरस्कार, १९८३
  • दिल्ली हिन्दी अकादमी का साहित्यकार सम्मान २००३-२००४
  • एन.सी.ई.आर.टी. का राष्ट्रीय बाल-साहित्य पुरस्कार, १९८९
  • दिल्ली हिन्दी अकादमी का बाल-साहित्य पुरस्कार, १९८७
  • भारतीय बाल-कल्याण संस्थान, कानपुर का सम्मान १९९१
  • बालकनजी बारी इंटरनेशनल का राष्ट्रीय नेहरू बाल साहित्य एवार्ड १९९२
  • इंडो-रशियन लिटरेरी कल्ब, नई दिल्ली का सम्मान १९९५
  • कोरियाई दूतावास से प्रशंसा-पत्र २००१बंग नागरी प्राचारिणी सभा का पत्रकार शिरोमणि सम्मान १९७६ में।
  • प्रकाशित कृतियाँ :कविताः 'रास्ते के बीच', 'खुली आंखों में आकाश', 'हल्दी-चावल और अन्य कविताएं', 'छोटा-सा हस्तक्षेप', 'फूल तब भी खिला होता' (कविता-संग्रह)। 'खण्ड-खण्ड अग्नि' (काव्य-नाटक)। 'फेदर' (अंग्रेजी में अनूदित कविताएं)। 'से दल अइ ग्योल होन' (कोरियाई भाषा में अनूदित कविताएं)। 'अष्टावक्र' (मराठी में अनूदित कविताएं)। 'गेहूँ घर आया है' (चुनी हुई कविताएँ, चयनः अशोक वाजपेयी)।
  • आलोचना एवं शोधः  नये कवियों के काव्य-शिल्प सिद्धान्त, ‘कविता के बीच से’, ‘साक्षात् त्रिलोचन’, ‘संवाद भी विवाद भी’। ‘निषेध के बाद’ (कविताएं), ‘हिन्दी कहानी का समकालीन परिवेश’ (कहानियां और लेख), ‘कथा-पडाव’ (कहानियां एवं उन पर समीक्षात्मक लेख), ‘आंसांबल’ (कविताएं, उनके अंग्रेजी अनुवाद और ग्राफिक्स), ‘दूसरा दिविक’ आदि का संपादन।
  •  ‘कोरियाई कविता-यात्रा’ (हिन्दी में अनूदित कविताएं)। ‘द डे ब्रक्स ओ इंडिया’ (कोरियाई कवयित्री किम यांग शिक की कविताओं के हिंदी अनूवाद) । ‘सुनो अफ्रीका’।
  • बाल-साहित्यः ‘जोकर मुझे बना दो जी’, ‘हंसे जानवर हो हो हो’, ‘कबूतरों की रेल’, ‘छतरी से गपशप’, ‘अगर खेलता हाथी होली’, ‘तस्वीर और मुन्ना’, ‘मधुर गीत भाग ३ और ४’, ‘अगर पेड भी चलते होते’, ‘खुशी लौटाते हैं त्यौहार’, ‘मेघ हंसेंगे जोर-जोर से’ (चुनी हुई बाल कविताएँ, चयनः प्रकाश मनु)। ‘धूर्त साधु और किसान’, ‘सबसे बडा दानी’, ‘शेर की पीठ पर’, ‘बादलों के दरवाजे’, ‘घमण्ड की हार’, ‘ओह पापा’, ‘बोलती डिबिया’, ‘ज्ञान परी’, ‘सच्चा दोस्त’, (कहानियां)। ‘और पेड गूंगे हो गए’, (विश्व की लोककथाएँ), ‘फूल भी और फल भी’ (लेखकों से संबद्ध साक्षात् आत्मीय संस्मरण)। ‘कोरियाई बाल कविताएं’। ‘कोरियाई लोक कथाएं’। ‘कोरियाई कथाएँ’।
  • ‘और पेड गूंगे हो गए’, ‘सच्चा दोस्त’ (लोक कथाएं)।
  • अन्यः ‘बल्लू हाथी का बाल घर’ (बाल-नाटक)। 
  • ‘खण्ड-खण्ड अग्नि’ के मराठी, गुजराती और अंग्रेजी अनुवाद।
  • अनेक भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में रचनाएं अनूदित हो चुकी हैं। रचनाएं पाठयक्रमों में निर्धारित।
  • विशेष : २०वीं शताब्दी के आठवें दशक में अपने पहले ही कविता-संग्रह ’रास्ते के बीच‘ से चर्चित हो जाने वाले आज के सुप्रतिष्ठित हिन्दी-कवि बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। ३८ वर्ष की आयु में ही ’रास्ते के बीच‘ और ’खुली आंखों में आकाश‘ जैसी अपनी मौलिक साहित्यिक कृतियों पर सोवियत लैंड नेहरू एवार्ड जैसा अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाले ये पहले कवि हैं। १७-१८ वर्षों तक दूरदर्शन के विविध कार्यक्रमों का संचालन किया। १९९४ से १९९७ में भारत सरकार की ओर से दक्षिण कोरिया में अतिथि आचार्य के रूप में भेजे गए जहाँ इन्होंने साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में कितने ही कीर्तिमान स्थापित किए। वहाँ के जन-जीवन और वहाँ की संस्कृति और साहित्य का गहरा परिचय लेने का प्रयत्न किया। परिणामस्वरूप ऐतिहासिक रूप में, कोरियाई भाषा में अनूदित-प्रकाशत हिन्दी कविता के पहले संग्रह के रूप में इनकी अपनी कविताओं का संग्रह ’से दल अइ ग्योल हान‘ अर्थात् चिड़िया का ब्याह है। इसी प्रकार साहित्य अकादमी के द्वारा प्रकाशित इनके द्वारा चयनित और हिन्दी में अनूदित कोरियाई प्राचीन और आधुनिक कविताओं का संग्रह ’कोरियाई कविता-यात्रा‘ भी ऐतिहासिक दृष्टि से हिन्दी ही नहीं किसी भी भारतीय भाषा में अपने ढंग का पहला संग्रह है। साथ ही इन्हीं के द्वारा तैयार किए गए कोरियाई बाल कविताओं और कोरियाई लोक कथाओं के संग्रह भी ऐतिहासिक दृष्टि से पहले हैं।
  • दिविक रमेश की अनेक कविताओं पर कलाकारों ने चित्र, कोलाज और ग्राफिक्स आदि बनाए हैं। उनकी प्रदर्शनियाँ भी हुई हैं। इनकी बाल-कविताओं को संगीतबद्ध किया गया है। जहाँ इनका काव्य-नाटक ’खण्ड-खण्ड अग्नि‘ बंगलौर विश्वविद्यालय की एम.ए. कक्षा के पाठ्यक्रम में निर्धारित है वहाँ इनकी बाल-रचनाएँ पंजाब, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र बोर्ड तथा दिल्ली सहित विभिन्न स्कूलों की विभिन्न कक्षाओं में पढ़ायी जा रही हैं। इनकी कविताओं पर पी-एच.डी के उपाधि के लिए शोध भी हो चुके हैं।
  • इनकी कविताओं को देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित संग्रहों में स्थान मिला है। इनमें से कुछ अत्यंत उल्लेखनीय इस प्रकार हैं १. इंडिया पोयट्री टुडे (आई.सी.सी.आर.), १९८५, २. न्यू लैटर (यू.एस.ए.) स्प्रिंग/समर, १९८२, ३. लोटस (एफ्रो-एशियन राइटिंग्ज, ट्युनिस श्ज्नदपेश् द्धए वॉल्यूमः५६, १९८५, ४. इंडियन लिटरेचर ;(Special number of Indian Poetry Today) साहित्य अकादमी, जनवरी/अप्रैल, १९८०, ५. Natural Modernism (peace through poetry world congress of poets) (१९९७) कोरिया, ६. हिन्दी के श्रेष्ठ बाल-गीत (संपादकः श्री जयप्रकाश भारती), १९८७, ७. आठवें दशक की प्रतिनिधि श्रेष्ठ कविताएं (संपादकः हरिवंशराय बच्चन)।
  • दिविक रमेश अनेक देशों जैसे जापान, कोरिया, बैंकाक, हांगकांग, सिंगापोर, इंग्लैंड, अमेरिका, रूस, जर्मनी, पोर्ट ऑफ स्पेन आदि की यात्राएं कर चुके हैं।
  • संप्रति :  प्राचार्य, मोतीलाल नेहरू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
  • सम्पर्क : divik_ramesh@yahoo.com

बुधवार, 21 जून 2017

कुंवर नारायण की कविताएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

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नई कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर श्री कुँवर नारायण अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक (1959) के प्रमुख कवियों में रहे हैं। उनका जन्म 19 सितंबर 1927 को हुआ। कुँवर नारायण को अपनी रचनाशीलता में इतिहास और मिथक के जरिये वर्तमान को देखने के लिए जाना जाता है। उनका रचना संसार इतना व्यापक एवं जटिल है कि उसको कोई एक नाम देना सम्भव नहीं। यद्यपि कुंवर नारायण की मूल विधा कविता रही है पर इसके अलावा उन्होंने कहानी, लेख व समीक्षाओं के साथ-साथ सिनेमा, रंगमंच एवं अन्य कलाओं पर भी बखूबी लेखनी चलायी है। इसके चलते जहाँ उनके लेखन में सहज संप्रेषणीयता आई वहीं वे प्रयोगधर्मी भी बने रहे। उनकी कविताओं-कहानियों का कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। ‘तनाव‘ पत्रिका के लिए उन्होंने कवाफी तथा ब्रोर्खेस की कविताओं का भी अनुवाद किया है। 2009 में उन्हें वर्ष 2005 के लिए देश के साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यहाँ प्रस्तुत हैं उनकी कुछ रचनाएं....
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घबरा कर


वह किसी उम्मीद से मेरी ओर मुड़ा था 
लेकिन घबरा कर वह नहीं मैं उस पर भूँक पड़ा था ।
ज़्यादातर कुत्ते 
पागल नहीं होते 
न ज़्यादातर जानवर 
हमलावर 
ज़्यादातर आदमी 
डाकू नहीं होते 
न ज़्यादातर जेबों में चाकू
ख़तरनाक तो दो चार ही होते लाखों में 
लेकिन उनका आतंक चौकता रहता हमारी आँखों में ।
मैंने जिसे पागल समझ कर 
दुतकार दिया था 
वह मेरे बच्चे को ढूँढ रहा था 
जिसने उसे प्यार दिया था।


ऐतिहासिक फ़ासले


अच्छी तरह याद है
तब तेरह दिन लगे थे ट्रेन से
साइबेरिया के मैदानों को पार करके
मास्को से बाइजिंग तक पहुँचने में।
अब केवल सात दिन लगते हैं
उसी फ़ासले को तय करने में −
हवाई जहाज से सात घंटे भी नहीं लगते।
पुराने ज़मानों में बरसों लगते थे
उसी दूरी को तय करने में।
दूरियों का भूगोल नहीं
उनका समय बदलता है।
कितना ऐतिहासिक लगता है आज
तुमसे उस दिन मिलना।


आँकड़ों की बीमारी


एक बार मुझे आँकड़ों की उल्टियाँ होने लगीं
गिनते गिनते जब संख्या 
करोड़ों को पार करने लगी 
मैं बेहोश हो गया
होश आया तो मैं अस्पताल में था 
खून चढ़ाया जा रहा था 
आँक्सीजन दी जा रही थी 
कि मैं चिल्लाया 
डाक्टर मुझे बुरी तरह हँसी आ रही 
यह हँसानेवाली गैस है शायद 
प्राण बचानेवाली नहीं 
तुम मुझे हँसने पर मजबूर नहीं कर सकते 
इस देश में हर एक को अफ़सोस के साथ जीने का 
पैदाइशी हक़ है वरना 
कोई माने नहीं रखते हमारी आज़ादी और प्रजातंत्र
बोलिए नहीं - नर्स ने कहा - बेहद कमज़ोर हैं आप 
बड़ी मुश्किल से क़ाबू में आया है रक्तचाप
डाक्टर ने समझाया - आँकड़ों का वाइरस 
बुरी तरह फैल रहा आजकल 
सीधे दिमाग़ पर असर करता 
भाग्यवान हैं आप कि बच गए 
कुछ भी हो सकता था आपको –
सन्निपात कि आप बोलते ही चले जाते 
या पक्षाघात कि हमेशा कि लिए बन्द हो जाता 
आपका बोलना 
मस्तिष्क की कोई भी नस फट सकती थी 
इतनी बड़ी संख्या के दबाव से 
हम सब एक नाज़ुक दौर से गुज़र रहे 
तादाद के मामले में उत्तेजना घातक हो सकती है 
आँकड़ों पर कई दवा काम नहीं करती 
शान्ति से काम लें 
अगर बच गए आप तो करोड़ों में एक होंगे .....
अचानक मुझे लगा 
ख़तरों से सावधान कराते की संकेत-चिह्न में 
बदल गई थी डाक्टर की सूरत 
और मैं आँकड़ों का काटा 
चीख़ता चला जा रहा था 
कि हम आँकड़े नहीं आदमी हैं।

सोमवार, 11 अप्रैल 2016

नाज़िम हिक़मत की कविताएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


मेरी कविता के बारे में


मेरे पास सवारी करने के लिए
चाँदी की काठी वाला अश्व न था
रहने के लिए कोई पैतृक निवास न था
न धन दौलत थी और न ही अचल सम्पत्ति
एक प्याला शहद ही था जो मेरा अपना था
एक प्याला शहद
जो आग की तरह सुर्ख़ था !
मेरा शहद ही मेरे लिए सब कुछ था
मैनें अपनी धन दौलत
अपनी अचल सम्पदा की रखबाली की
हर क़िस्म के जीव-जन्तुओं से उसकी रक्षा की
मेरे सहोदर, तनिक प्रतीक्षा तो करो
यहाँ मेरा आशय
मेरे शहद भरे पात्र से ही है
जैसे ही मैं
अपना पात्र शहद से भर लूँगा
मक्खियाँ टिम्बकटू से चलकर
इस तक आएँगी !


कुछ सलाह उनके लिए जो उद्देश्य के लिए जेल में हैं


गर्दन पर फन्दा कसने के बजाय
यदि धकेल दिया जाए तुम्हें काल-कोठरी में
महज़ इसलिए
कि दुनिया के लिए, अपने देश के लिए,
अपनों के लिए उम्मीद नही छोड़ी तुमने
यदि ज़िन्दगी के बाक़ी बचे दस-पन्द्रह वर्षों में भी
तुम्हारे साथ यही सुलूक होता रहे
तो तुम यह भी नही कह पाओगे कि अच्छा होता
जो मुझे रस्सी के छोर पर एक झण्डे की तरह टाँग दिया जाता
किन्तु तुम्हें डटे रहना होगा और जीना होगा
वास्तव में यह तुम्हें ख़ुशी नही दे सकता
लेकिन तुम्हारा यह परम कर्तव्य है
दुश्मन का विरोध करने के लिए तुम
एक दिन और जियो
मुमकिन है कि
कुएँ के तल से आती आवाज़ की तरह
तुम्हारा अन्तर्मन भी अकेलेपन से भर उठे
किन्तु दूसरी ओर
दुनिया की हड़बड़ी देख
भीतर ही भीतर सिहर उठोगे तुम
बाह्य जगत में एक पत्ती भी
चालीस दिनों के अन्तराल पर निकलती है
अन्तर्घट से आती आवाज़ के लिए प्रतीक्षा करना
दुःख भरे गीत गाना
या पूरी रात छत ताकते हुए जागते रहना
भला तो है किन्तु डरावना भी है
हर बार हजामत बनाते हुए
अपने चेहरे को देखो !
भूल जाओ अपनी उम्र !
दुश्मन से सतर्क रहो
और मधुमास की रातों के लिए
रोटी का आख़िरी टुकड़ा खाना
हमेशा याद रखो
और कभी मत भूलो
दिल से खिलखिलाना !
कौन जानता है
वह महिला जिसे तुम प्रेम करते हो
कल तुम्हें प्रेम करना ही छोड़ दे
मत कहना यह कोई बड़ा मसला नही है
यह मनुष्य के लिए
मन की हरी डाली तोड़ देने जैसा होगा
मन ही मन गुलाबों और बाग़ीचों के बारे में
सोचते रहना फिजूल है
वहीँ समन्दर और पर्वतों के बारे में सोचना उत्तम होगा
बिना रुके पढ़ते-लिखते रहो
और मैं तुम्हें बुनने और
दर्पण बनाने की सलाह भी दूँगा
मेरा आशय यह कतई नही है
तुम दस या पन्द्रह वर्ष
जेल में नही रह सकते
इससे कहीं ज़्यादा .....
तुम कर सकते हो
जब तक
तुम्हारे हृदय के बाईं ओर स्थित मणि
अपनी कान्ति न गँवा दे !

(अंग्रेज़ी से अनुवाद : नीता पोरवाल)


सोमवार, 7 मार्च 2016

मैं ब्रह्मा हूँ एवं अन्य कविताएं-दिव्या माथुर


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


मैं ब्रह्मा हूँ



मैं ब्रह्मा हूँ
ये सारा ब्रह्मांड
मेरी ही कोख से जन्मा है
पाला है इसे मैंने
ढेर सा प्यार-दुलार देकर
और ये मेरे ही जाए
मेरी ही गोद का
बँटवारा करने पर तुले हैं
चिंदी चिंदी कर डाला है
मेरा आँचल
युद्ध चल रहा है 
मेरी ही गोद में
ग़रीबों को कुचल रहें हैं अमीर
कमज़ोरों को धमका रहे हैं बलशाली
मैं किसके संग रहूँ
या किसको सही कहूँ
जिसको भी समझाना चाहूँ
वह ही विरुद्ध हो जाता है
’बहकावे में आ जाती हूँ’
मुझपर इल्ज़ाम लगाता है
एक दिन मुझसे जगह पलटें
ता जानेंगे दुविधा माँ की
क्या सह पायेंगे पल भर भी
सतत वे पीड़ा ब्रह्मा की?


तेरे जाने के बाद..


जब तुम घर आते थे शाम को
दिल की धड़कन थम जाती थी
झट दौड़ के मुन्नी कमरे के
किसी कोने में छिप जाती थी
टूटे फूटे अब दरवाज़े
चौखट तो है खिड़कियाँ नहीं
टेढ़े मेढ़े बर्तन हैं बचे
मार नहीं झिड़कियाँ नहीं
आँखों के आगे धरती भी
न जाने कब से घूमी नहीं
न ही दिन को तारे दिखते हैं
अब नींद में डरके उठती नहीं
नन्हीं सी एक आहट पर 
अब दिल जाता है सिमट नहीं
लोगों से नज़र मिलाने में
अब होती कोई झिझक नहीं
अक्कड़ बक्कड़ से खेल हैं अब
न सही जो टूटे खिलौने नहीं
चेहरों पे हमारे शरारत है
उँगलियों के तेरी, निशान नहीं
सामान बिक गया सारा पर
घर भरा-भरा सा लगता है
भर पेट न चाहे खाया हो
मन हरा भरा सा रहता है।


बसंत


स्वर्णिम धूप, हरा मैदान
      पीली सरसों हुई जवान
              चुस्त हुआ, रंगों में नहा
                   लो देखो वयस्क हुआ उद्यान
झील में हैं कुछ श्वेत कमल
        या बादल नभ पर रहे टहल
                     मृदु गान से कोयल के मोहित
                                हैं नाच रहे मोरों के दल
यूँ पवन की छेड़ाछेड़ी से
            उद्विग्न हैं कालियाँ
                      फूलों का पा संरक्षण 
                                निश्चिंत हैं कालियाँ
फूलों से चहुं ओर घिरे
          भौंरे जैसे मद पान किए
                ख़याल तेरा भी भंग पिए
                              आया बसंत को संग लिए

मलबा


लगता है ये रौरव नर्क मुझे
हो रहा है तांडव अग्नि का
यह किसका हाथ
वह किसका पाँव
यह धूलधूसरित सिर
किसका
क्या इस कपाल के पिता हो तुम
बोलो इस धड़ की माँ है कौन
क्यूँ गले लगाते अपने नहीं
क्या सूँघ साँप कर गया मौन
इक जली हुई अँगुली में अँगूठी
किसी को तन्हा छोड़ गई है
किसी के जीवन की धारा का
सदा को रुख़ यह मोड़ गई है
इक युवती का डिज़ाइनर पर्स
निज होगा कभी, अब बिखरा पड़ा है
पाउडर, रूज और लिपस्टिक को
काजल ने अब हथिया लिया है
ख़ासा महँगा किसी का जूता
धुएँ में लिपटा उल्टा पड़ा है
बहुत ही जल्दी में वो होगा
नंगे पाँव जो चला गया है।

कसक


इधर भागी, उधर भागी
उछली कूदी, लपकी, लाँघी
काँपी, तड़पी, उलटी, पलटी
कटी पूँछ मरी औंधी
बेबस और बेकल छिपकली
कर्मों को अपने रोती रही

ज़ख़्म भर गया जल्दी ही
न और उसे कुछ याद रहा
न तो दर्द
न ही कोई सदमा
खालीपन था 

कुछ लमहों का
मन को जब समझा उसने लिया
तो निकल आई इक पूँछ नई
छोटी, मोटी बेहद भद्दी

कर्मों का रोना छोड़
हड़पती है वह अब नित
कीड़े मकौड़े ढेर कि
जाए उसकी कसक मिट


दिव्या माथुर




  • दिव्या माथुर का जन्म दिल्ली में हुआ और वहाँ से एम.ए. (अँग्रेज़ी) करने के पश्चात दिल्ली व ग्लास्गो से पत्रकारिता का डिप्लोमा किया। चिकित्सा-आशुलिपि का स्वतंत्र अध्ययन भी किया। 1985 में आप भारतीय उच्चायोग से जुड़ीं और 1992 से नेहरु केंद्र में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। उनका लंदन के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन में अपूर्व योगदान रहा है। रॉयल सोसाइटी ऑफ़ आर्ट्‌स की फ़ेलो हैं। नेत्रहीनता से सम्बन्धित कई संस्थाओं में इनका अभूतपूर्व योगदान रहा है। इसी विषय पर इनकी कहानियाँ और कविताएँ ब्रेल लिपि में प्रकाशित हो चुकीं हैं। आशा फ़ाउँडेशन और ‘पेन’ संस्थाओं की संस्थापक-सदस्य, चार्नवुड, आर्ट्‌स की सलाहकार, यू. के. हिंदी समिति की उपाध्यक्ष, भारत सरकार के आधीन, लंदन के उच्चायोग की हिंदी कार्यकारिणी समिति की सदस्या, कथा यू. के. की पूर्व अध्यक्ष और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन की सांस्कृतिक अध्यक्ष, दिव्या जी कई पत्र, पत्रिकाओं के सम्पादक मंडल में शामिल हैं। अंत:सलिला, रेत का लिखा, ख्याल तेरा और 11 सितम्बर: सपनों की राख तले (कविता संग्रह)। आक्रोश (कहानी संग्रह-प्रो. स्टुअर्ट मैक्ग्रेगर द्वारा विमोचित एवं पद्मानंद साहित्य सम्मान द्वारा सम्मानित), ओडेस्सी: स्टोरीज़ बाई इंडियन वुमैन राईटरज़ सेटलड एबरॉड (अंग्रेज़ी में संपादन, डा. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी द्वारा विमोचित) एवं आशा: स्टोरीज़ बाई इंडियन वुमैन राईटरज़ (अँग्रेज़ी में संपादन, साराह माईल्स द्वारा विमोचित) शीघ्र प्रकाश्य : ‘एक शाम भर बातें’ एवं ‘जीवन हा! मृत्यु‘। उनकी कहानियाँ और कविताएँ भिन्न भाषाओं के संकलनों में शामिल की गई हैं। आक्रोश, ओडेस्सी (सईद जाफरी द्वारा विमोचित) एवं आशा- तीनों संग्रहों के पेपरबैक संस्करण आ चुके हैं। जहाँ पॉल रौबसन द्वारा प्रस्तुत दिव्या माथुर के नाटक 'टेट-ए-टेट' की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई, वहीं उनकी दो अन्य कहानियों - ‘एक शाम भर बातें’ एवं ‘अपूर्व दिशा’ का भी सफल मंचन हो चुका है। रेडियो एवं दूरदर्शन पर इनके कार्यक्रम के नियमित प्रसारण के अतिरिक्त, इनकी कविताओं को कला संगम संस्था ने भारतीय नृत्य शैलियों के माध्यम से सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया।
  • राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सम्मानित एवं निमंत्रित, दिव्या जी को Arts Achiever-2003 Award (Arts Council of England), Indivi™als of Inspiration and Dedication ह्मonour (Chinmoy Mission) एवं संस्कृति सेवा सम्मान से अलंकृत किया जा चुका है।
  • लंदन में कहानियों के मंचन की शुरुआत का सेहरा भी आपके सिर जाता है। रीना भारद्वाज, कविता सेठ और सतनाम सिंह सरीखे विशिष्ठ संगीतज्ञों ने इनके गीत और ग़ज़लों को न केवल संगीतबद्ध किया, अपना स्वर भी दिया है।
  • सम्पर्क : DivyaMathur@aol.com


सोमवार, 18 जनवरी 2016

कुछ कविताएं काव्यकृति ‘सरहदें’ से-सुबोध श्रीवास्तव



विनोद शाही की कलाकृति


उसे आना ही है...


खोल दो
बंद दरवाजे/ खिड़कियां
मुग्ध न हो/ न हो प्रफुल्लित
जादू जगाते
दीपक के आलोक से।
निकलो
देहरी के उस पार
वंदन-अभिनंदन में
श्वेत अश्वों के रथ पर सवार
नवजात सूर्य के।
वो देखो-
चहचहाने लगे पंछी
सतरंगी हो उठीं दिशाएं
हां, सचमुच
कालिमा के बाद
आना ही है/ उसे
रश्मियां बिखेरकर
आल्हादित करने
विश्व क्षितिज को..!


जब, एक दिन


वहां, जहां खड़ा है
वह वृक्षमानव
आसपास बसती है
एक समूची दुनिया।
वृक्षमानव
बखूबी जानता है कि
कल, जब वह
जी भी नहीं पाया होगा
अपनी पूरी उम्र,
बांट न पाया होगा
सबको
ठंडी छांव,
सुन नहीं पाया होगा
जीभरकर किलकारियां
अपनी शाखों पर
इधर-उधर
नटखट बंदरों से झूलते
बच्चों की,
तभी-
उसके ही जिस्म के
एक हिस्से में जड़ी
कुल्हाड़ी थामे
कई जोड़ा हाथ
क्षण भर में मिटा देंगे
उसका अस्तित्व।
फिर कोई कारीगर
उसके शरीर को
कई हिस्सों में बांटकर
बनाएगा
आधुनिक शैली में
फर्नीचर के उत्कृष्ट नमूने-
जिन पे बैठकर बनेंगी
पर्यावरण रक्षा की
अनेक योजनाएं।
फिर भी वह
विस्मृत नहीं कर पाता
आदमियत के साथ अपना रिश्ता
क्योंकि-
वह यह भी जानता है कि
आधुनिकता की दौड़ में
बदहवास सा भागता आदमी
जब हर कहीं मिटा चुका होगा
हरियाली का अस्तित्व
किसा रोज/शाम को
कंकरीट के जंगल से उकताकर
वापस लौटने पर
उसका बच्चा
रोपता मिलेगा/एक नन्हा पौधा
तब उसे, अचानक याद आयेगा
बचपन में-
खुद का पेड़ों पर झूलना
और वह
सहमे से बच्चे को
पुचकार कर उठा लेगा गोद में।


वर्षा: एक शब्दचित्र


गली के नुक्कड़ पे 
बारिश की रिमझिम के बाद 
उस छोर से आती 
छोटी सी नदी में 
छपाक-छपाक करते 
अधनंगे बच्चे,
डगमगाकर आतीं 
कागज़ की छोटी-छोटी कश्तियां
पल भर को ताजा कर गईं
स्मृतियां-
घर/बचपन की।
घर और बचपन
दोनों ही पर्यायवाची शब्द हैं
अस्थायित्व के 
बचपन-
हमेशा पास नहीं रहता
सरक जाता है घुटनों के बल
जाने कब?
और घर भी 
हमेशा 'घर' होने का एहसास
नहीं दिलाता 
हर किसी को।


आज भी


आज फिर
मचल गया
देहरी पे पांव रखता
नन्हा बच्चा।
एक पल ठिठक कर
कल मिली
पिता की डांट याद करता है
फिर, हौले से पुचकार कर
ज़मीन पे रेंगते
जहरीले कीड़े को-
सूखे पेड़ के सुपुर्द करते हुए
क्लास में
टीचर के पढ़ाए सबक को
कार्यरूप देता है।
बच्चा/कीड़ा/पेड़
तीनों-
एक दूसरे के कोई नहीं
शायद इसीलिए
अब भी सांस ले रही है
मानवता..!


उम्मीद का दायरा


जहां खत्म होता है
उम्मीद का दायरा
वहीं से करो/ तुम
इक नई शुरुआत।
याद रखना-
हर शुरुआत
लबरेज़ होती है
ताज़ातरीन उम्मीदों से
जिसमें/ नाउम्मीदी की
कोई गुंजाईश नहीं होती
और
उम्मीद पे
दुनिया कायम है..!
(रचनाएं काव्य संग्रह 'सरहदें' से)

सुबोध श्रीवास्तव


'माडर्न विला', 10/518,
खलासी लाइन्स,कानपुर (उप्र)-208001.
मो.09305540745
ई-मेल: subodhsrivastava85@yahoo.in



सुबोध श्रीवास्तव


  • जन्म: 4 सितम्बर, 1966 (कानपुर)
  • मां: श्रीमती कमला श्रीवास्तव
  • पिता: स्व.श्री प्रेम नारायण दीवान
  • शिक्षा: परास्नातक
  • व्यवसाय: पत्रकारिता (वर्ष 1986 से)। 'दैनिक भास्कर', 'स्वतंत्र भारत' (कानपुर/लखनऊ) आदि में विभिन्न पदों पर कार्य।
  • विधाएं: नई कविता, गीत, गजल, दोहे, मुक्तक, कहानी, व्यंग्य, निबंध, रिपोर्ताज और बाल साहित्य। रचनाएं देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं,प्रमुख अंतरजाल पत्रिकाओं में प्रकाशित। दूरदर्शन/आकाशवाणी से प्रसारण भी।
  • प्रकाशित कृतियां:
  • 'पीढ़ी का दर्द' (काव्य संग्रह)
  • 'ईष्र्या' (लघुकथा संग्रह)
  • 'शेरनी मां' (बाल कथा संग्रह)
  • 'सरहदें' (काव्य संग्रह)
  • विशेष: काव्यकृति 'पीढ़ी का दर्द' के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा पुरस्कृत।
  • साहित्य/पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा 'गणेश शंकर विद्यार्थी अतिविशिष्ट सम्मान'।
  • कई अन्य संस्थाओं से भी सम्मानित।
  • संपादन: 'काव्ययुग' ई-पत्रिका
  • संप्रति: 'आज' (हिन्दी दैनिक), कानपुर में कार्यरत।
  • संपर्क: 'माडर्न विला',10/518, खलासी लाइन्स, कानपुर (उ.प्र.)-208001, उत्तर प्रदेश (भारत)।
  • मोबाइल: 09305540745/9839364419
  • फेसबुक:www.facebook.com/subodhsrivastava85
  • ट्विटर:www.twitter.com/subodhsrivasta3
  • ई-मेल: subodhsrivastava85@yahoo.in





  • पुस्तक-सरहदें/ कविता संग्रह
  • कवि-सुबोध श्रीवास्तव
  • पृष्ठ-96
  • मूल्य-120 रुपये 
  • बाईंडिंग-पेपरबैक
  • प्रकाशक-अंजुमन प्रकाशन, 
  • 942 मुट्ठीगंज, इलाहाबाद, 
  • उत्तर प्रदेश (भारत)
  • मोबाइल: +91-9453004398
  • ISBN12: 9789383969722
  • ISBN10: 9383969722
  • http://www.anjumanpublication.com

सोमवार, 21 दिसंबर 2015

दो कविताएं-पुष्पराज चसवाल


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



जीवन-ज्योति 


आओ
हम उन्हें
एक और ज़िन्दगी की
राह दिखाएँ
उन्हें
जो जीने के रास्ते
भूल चुके हैं या
बंद समझ चुके हैं,
आओ
हम उन्हें
बताने की कोशिश करें
जीवन-ज्योति
क्रिश्चन कैलेंडर में
या
विक्रमी संवत में
क़ैद, मापदंड नहीं
जीवन-ज्योति
अखंड ज्योति है
सहस्र सूर्यों से परे
क्षितिज की सभी
सीमाओं के पार
अलौकिक नृत्य में
मगन, पार
मानवीय पकड़ के।


दिशा-ज्ञान 


ओ धरा के जीव,
युगों से बनकर व्योम-पक्षी
व्योम-फूल से बातें करते -
थके नहीं हो क्या?

आदिकाल से
अंतकाल तक
विचरते
एक छोर से
सहस्र छोर तक भटकते
है कौन
चिरंतन सत्य
या विलक्षण सत्ता
तुमने जाना?

खो जाने में,
जो मिलता है -
देख चुके हो!
पा जाने में,
क्या मिलता है-
कैसे जानो?

मानव हो तुम,
मानवी है धरा।
लिए कर में -
अमृत-कलश,
कब से तुम्हें पुकारती
अंतरंग निहारती,
पालकी सजी-सजी,
आ रही पहचान-सी,

भ्रम को छोड़ो!
लौट भी आओ
इस धरती से
नाता जोड़ो।
युगों से जिसको
ढूंढ रहे हो,
पा जाओगे
क्षण भर में ही,
वह अमरत्व -
वह दुर्लभ जीवन रस।



पुष्प राज चसवाल


  • जन्म तिथि: 1944-06-13
  • जन्म स्थान: गाँव ददवाल, ज़िला रावलपिंडी (अब पाकिस्तान में)
  • शिक्षा: B.A., M.B.A.
  • प्रकाशित कृतियाँ: "दिशाएं" (काव्य- संग्रह, १९९१), "संवेदनाओं के घेरे" (काव्य -संग्रह, २००१) "कर्म-क्षेत्र" (उपन्यास, २००९)
  • लेखन: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियां निरंतर प्रकाशित मुख्यतः हरिगंधा (पंचकूला, हरियाणा), शब्द सरोकार (पटियाला,पंजाब) इंगित (ग्वालियर, मध्य प्रदेश), सफ़र ज़ारी है (तश्नगाने-अदब, दिल्ली),  पुष्पगन्धा (अम्बाला,हरियाणा), वीर प्रताप (जालंधर,पंजाब), दैनिक ट्रिब्यून (चंडीगढ़, यू टी);
  • पी.पी. प्रकाशन द्वारा ६ किताबों के प्रकाशन में सक्रिय भूमिका; हिंदी के त्रैमासिक ई-पत्रिका 'अनहद कृति' (www.anhadkriti.com) में सक्रिय लेखन एवं सम्पादन।
  • जालघर पर 'स्वर्गविभा' में कविताएं।
  • सम्प्रति: बैंक ऑफ़ बड़ोदा से २००१ में प्रबंधक पद से अवकाश-प्राप्त; पी. पी. प्रकाशन में मुख्य-संस्थापक; वर्ष २०१३ में जीवनसंगिनी डॉ प्रेम लता चसवाल 'प्रेम पुष्प'  के साथ पी.पी.प्रकाशन (अम्बाला, शहर) के अंतर्गत - हिंदी साहित्य, कला एवं सामजिक सरोकारों की ई-पत्रिका 'अनहद-कृति' की संस्थापना और अब 'अनहद कृति' ई-त्रैमासिकी में सक्रीय लेखन एवं सह-सम्पादन।
  • रुचियाँ: इतिहास पठन, साहित्य पठन-पाठन, वाद-विवाद, काव्य पाठ, और नाट्य मंचन के साथ राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सरोकारों के बारे में जानकारी पाने में गहरी रूचि; महत्वपूर्ण ऐतिहासिक हस्तियों के भाषणों का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद। 
  • सम्मान: तीसरी कक्षा में ही १९५३ (1953) में प्रधान-मंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू व इंगलैंड के प्रधान-मंत्री हेराल्ड मैकमिलन के समक्ष 'आदर्श ग्राम'  में लघु नाटिका में नायक की भूमिका, चौथी कक्षा से लेकर स्नातक की परीक्षाओं में उत्कृष्टता छात्रवृत्ति से सम्मानित, कॉलेज के दिनों में यूथ-फेस्टिवल एवं अंतर-महाविद्यालय काव्य-पाठ, भाषण प्रतियोगिताओं व नाट्य-मंचन में कई बार प्रथम पुरस्कार, विशेषकर उल्लेखनीय है वर्ष १९६५ में बटाला में आयोजित अंतर-महाविद्यालय काव्य-पाठ प्रतियोगिता में पंजाबी के कवि शिरोमणि शिव कुमार बटालवी द्वारा पुरस्कृत, पंजाब विश्वविद्यालय, यूथ वेलफेयर विभाग द्वारा आयोजित प्रशिक्षण-कैम्प के बाद कॉलेज में यूथ लीडरशिप ऐसोसिएशन (वाई.एल ए) के संस्थापक प्रधान १९६५ (1965),  बैंक ऑफ़ बड़ोदा, दिल्ली अंचल द्वारा हिंदी-दिवस पर आयोजित समारोह में लगातार तीन वर्ष तक अनुवाद में प्रथम पुरस्कार १९८४-८६ (1984-86); "दिशाएं" १९८८ (1988)एवं "संवेदनाओं के घेरे" २००१ (2001) का प्रकाशन हरियाणा साहित्य अकादमी के सहयोग से; हरियाणा साहित्य अकादमीद्वारा आयोजित हरियाणा भ्रमण यात्रा में अम्बाला के प्रतिनिधि रचनाकार के रूप में प्रतिनिधित्व, बैंक ऑफ़ बड़ोदा कर्मचारी संगठन (पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर,चंडीगढ़ क्षेत्र) में पंद्रह वर्ष तक प्रधान एवं महासचिव के रूप में सक्रिय भूमिका;  वर्ष १९७०-८० (1970 -80) के दशक में गुड़गांव में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों में सक्रिय भूमिका, वर्ष १९७०-८० (1970-80) व १९८०-९० (1980-90) में गुडगाँव, करनाल, अम्बाला में कई श्रमिक संगठनों में भागीदारी; कर्मचारी संगठन सभाओं में प्रभावशाली वक्ता; २००५ (2005) में यूनिवर्सिटी ऑफ़ विस्कॉन्सिन (संयुक्त राज्य अमरीका) में आयोजित "कांफ्रेंस ओन साउथ एशिया" में "लिट्रेसी इंक्रीज़िज़ द पेस ऑफ़ डेवेलपमेंट: एन इंडियन एग्ज़ाम्पल" वार्ता में मुख्य वक्ता; ऑल इंडिया रेडियो शिवपुरी, ग्वालियर (मध्य प्रदेश) तथा कुरुक्षेत्र (हरियाणा) से काव्य-पाठ एवं वार्ता का प्रसारण।
  • ईमेल: prchaswal@gmail.com

सोमवार, 7 दिसंबर 2015

मुकम्मल घर व अन्य कविताएं- डॉ सुधा उपाध्याय


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


             मुकम्मल घर



                बहुत सी उम्मीदों का असबाब बांधकर ,

                अम्मा मैंने एक घर बनाया है ...

                रहूंगी मैं वहां तुम्हारे साथ ,

                रहेगी मेरी बिटिया वहीं मेरे साथ

                घर के बाहर लगी होगी तख्ती तुम्हारी नातिन की

                अम्मा मैंने एक घर सजाया है...

                सजेगी फर्श तुम्हारी निश्छल मुस्कराहट से

                रंगेगी हर दीवार हमारे कहकहों से

                लगाउंगी घर के कोनों में बड़ा सा आइना

                जहाँ दिखेंगे हमें हमारे पुरुष

                अम्मा मैंने एक घर बसाया है ....

                आसमान की अलगनी पर सुखाउंगी तुम्हारी धोती

                अपनी सलवार कमीज़ और बिटिया की शर्ट पैंट

                आँगन में बिराजेंगे तुम्हारे शालिग्राम भगवान्

                रंसोयी में महकेगा सालन तुम्हारे हाँथ का

                छत पर सुखायेंगे हम अपने अपने आंसू

                बस तुम लौट आवो अम्मा ,...

                हम भी बना सकती हैं

                सजा सकती हैं

                बसा सकती हैं

                एक मुकम्मल घर

                   

             बुरा हुआ,...जो,...सो हुआ



                अब इस से बुरा और क्या होगा ?

                कि नन्हीं चिर्रैया अपने ही रंग रूप से

                है इन दिनों परेशान

                अपने हर हाव भाव पर ,

                फुदक चहक पर हो रही है सावधान

                उसने ,खुदने अपने दाने चुगने ,

                आँगन आँगन ,फुर्र फुर्र

                उड़ने पर लगा ली है पाबंदी

                समेट ली है अपनी हर मोहक अदा.....

                बेपरवाह पंखों को समेट

                उड़ जाना चाहती है नन्हीं चिर्रैया....

                तिनके तिनके जोड़ कर

                नहीं बसना चाहती कोई घोंसला

                आंधी तूफ़ान ,तेज़ बारिश से भी

                ज्यादा डरने लगी है

                उन बहेलियों से जो पुचकार कर दाना खिलते हैं

                रंग बिरंगी बर्ड हाउस तंग देते हैं रेलिंगों पर

                वहां कोई आशियाना नहीं बसना चाहती

                नन्हीं चिर्रैया

                फुसलाने ,बहलाने के सम्मोहन से

               आज़ाद होना चाहती है नन्हीं चिर्रैया

                डरने लगी है बेहिसाब अपने ही रंग रूप

                घाव भाव फुदक चहक...

                हर अदा पर अब नन्हीं चिर्रैया ...

                 
            

             आखिर कब



                एक ही सपना देखती हूँ आजकल

                मैं एक नन्हे बच्चे में तब्दील हो चुकी हूँ

                हाँथ में कूची और रंग लिए

                हंस हंस कर मैंने नीले नीले

                पहाड़ रंग डाले

                आकाश पर समुद्र और धरती पर

                सूरज उतार लायी

                सारे पंछी ज़मीन पर रेंगने लगे

                हांथी घोड़े ऊंट उड़ने लगे

                चंदा मामा नदी में नहा रहे थे

                सूरज चाचू कपडे धोने लगे

                आकाश में हरी हरी दूब उग आई

                वहां रेत थी, ईंटें भी, झोपड़ियाँ भी

                बहुत उड़ने वालों को अपनी औकात समझ में आरही थी

                सारे बच्चों की गेंदें आकाश में उछाल रही थीं

                चलो मैदान ना सही आकाश तो था खेलने की खातिर

                पर नींद यहीं आकर खुल जाती है ....

                आखिर कब सपना पूरा होगा?

  .

क्या आप जानते हैं..?



पिंजरा भर देता है मन में अनंत आकाश ,

हर बंधन से मु क्ति की छट पटा हट

जड़ता और रिवायतों से विरोध भाव ,

समस्त सुकुमार कोमल समझौतों के प्रति घृणा

यह तो पिंजरे में बंद चिरिया से पूछो ,

क्यूंकि वही जानती है आज़ादी के सही मायने

वो तरस खाती है उस आज़ाद चिरिया पर

जो कोमल घास पर फुदक फुदक कर

छोटे छोटे कीड़े मकौडों को आहार बनाती है

आज़ादी के सच्चे अर्थ नही जानती

और लम्बी तान गाती है ,

अपने में मशगूल

अपना आस पास भुला  देती है

उसके गीत में राग अधिक है वेदना कम

वह अपनी मोहक आवाज़ से

मूल मंत्र भी बिसरा देती है

यहाँ पिंजरे में बंद चिरिया की तान

दूर दूर चट्टानी पहाड़ों को भी

दरका सकती है

उसके गीत में दर्द से बढ़कर कुछ है

जिसे समझ सकती है

केवल पिंजरे की चिरिया...


अम्मा



मेरी हर वो जिद नाकाम ही रही

जो तुम्हारे बिना सोने जागने उगने डूबने

बुनने बनाने बड़े होने या.... 

सब कुछ हो जाने की थी

अब जैसे के तुम नहीं हो कहीं नहीं हो

कुछ नहीं हो पाता तुम्हारे बगैर

नींदों में सपनो का आना जाना

जागते हुए नयी आफत को न्योता देना

चुनौतियों को ललकारना

अब मुनासिब नहीं .


सहेज कर रखा है..



मैंने आज भी सहेज कर रखा है

वह सबकुछ जो अम्मा ने थमाई थी

घर छोड़ कर आते हुए

तुम्हारे लिए अगाध विश्वास

सच्ची चाहत ,धुले पूछे विचार

संवेदनशील गीत ,कोयल की कुहुक

बुलबुलों की उड़ान ,ताज़े फूलों की महक


तितली के रंग ,इतर की शीशी

कुछ कढाई वाले रुमाल

सोचती हूँ हवाई उड़ान भरते भरते

जब तुम थक जाओगे

मैं इसी खुरदुरी ज़मीन पर तुम्हे फिर मिल जाउंगी

जहाँ हम घंटों पसरे रहते थे मन गीला किये हुए

वे सब धरोहर दे दूँगी ख़ुशी से वे तुम्हारे ही थे

अक्षत तुम्हारे ही रहेंगे ....



डॉ सुधा उपाध्याय


बी-3, स्टाफ क्वार्टर्स,

जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज (दि.वि.वि),

सर गंगाराम अस्पताल मार्ग,

ओल्ड राजेंद्र नगर,

नई दिल्ली-110060

फोन-09971816506



डॉ सुधा उपाध्याय



कई विधाओं में स्वतंत्र लेखन करती रही हैं। समसामयिक अनेक प्रतिष्ठित
पत्र-पत्रिकाओं में कई आलेख, कहानी, कविताएं प्रकाशित और पुरस्कृत।
विश्वविद्यालय स्तर पर कई पुरस्कार भी अर्जित किए हैं। अध्ययन-अध्यापन के
अलावा अनेक गोष्ठियों, परिचर्चाओं और वाद-विवाद में सक्रिय भागीदारी रही
सुल्तानपुर (उ.प्र.) में जन्मी डॉ सुधा उपाध्याय गद्य और पद्य दोनों है। ‘
बोलती चुप्पी’ (राधाकृष्ण प्रकाशन) कविताओं का संकलन बेहद चर्चित
रहा है। समकालीन हिंदी साहित्य, साक्षात्कार, कथाक्रम, आलोचना,
इंद्रप्रस्थ भारती, सामयिक मीमांसा आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं
प्रकाशित। दिल्ली विश्वविद्यालय के जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज में हिंदी
विभाग की वरिष्ठ व्याख्याता के रुप में कार्यरत हैं। हाल ही में प्रकाशित
पुस्तक ‘हिंदी की चर्चित कवियित्रियां’ नामक कविता संकलन में कविताएं
प्रकाशित हुई हैं।

सोमवार, 16 नवंबर 2015

डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा की रचनाएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


ताँका कविताएँ..


 (एक)

निशा ने कहा
भोर द्वारे सजाए
निराशा नहीं
तारक आशा के हैं
चाँद आये न आए ।


(दो) 

सूरज कहे
ऐसा कर दिखाओ
व्याकुल -मना
वीथियाँ हों व्यथित
कभी तुम ना आओ ।


(तीन) 

कविता मेरी
बस तेरा वन्दन
तप्त पन्थ हों
तप्त पथिक मन
सुखदायी चन्दन |


(चार)

मैं मृण्मयी हूँ
नेह से गूँथ कर
तुमने रचा
अपना या पराया
अब क्या मेरा बचा |


(पांच) 

तुम भी जानो
ईर्ष्या विष की ज्वाला
फिर क्यूँ भला
नफ़रत को पाला
प्यार को न सँभाला |

(छह)

चाहें न चाहें
हम कहें न कहें
नियति -नटी
बस यूँ ही नचाए
रंग सारे दिखाए ।


सेदोका कविताएँ ...


(एक)

उड़ो परिंदे !
पा लो ऊँचे शिखर
छू लो चाँद -सितारे,
अर्ज़ हमारी-
इतना याद रहे
बस मर्याद रहे !

(दो)

जो तुम दोगे
वही मैं लौटाऊँगी
रो दूँगी या गाऊँगी ,
तुम्हीं कहो न
बिन रस ,गागर
कैसे छलकाऊँगी ?

(तीन)

सज़ा दी मुझे
मेरा क्या था गुनाह
फिर मुझसे कहा
अरी कविता
गीत आशा के ही गा
तू भरना न आह !

(चार)

आई जो भोर
बुझा दिए नभ ने
तारों के सारे दिए
संचित स्नेह
लुटाया धरा पर
किरणों से छूकर।

(पांच)

मन -देहरी
आहट सी होती है
देखूँ, कौन बोलें हैं ?
आए हैं भाव
संग लिये कविता
मैंनें द्वार खोले हैं ।

(छह)

अकेली चली
हवा मन उदास
कितनी दुखी हुई
साथी जो बने
चन्दन औ' सुमन
सुगंध सखी हुई ।

(सात)

मन से छुआ
अहसास से जाना
यूँ मैंने पहचाना
मिलोगे कभी
इसी आस जीकर
मुझको मिट जाना ।

(आठ)

बूँद-बूँद को
समेट कर देखा
सागर मिल गया
मैं सींच कर
खिला रही कलियाँ
चमन खिल गया।

(नौ)

जीवन-रथ
विश्वास प्यार संग
चलते दो पहिये
समय -पथ
है सुगम ,दुखों की
बात ही क्या कहिए।

(दस)

मेरे मोहना
उस पार ले चल
चलूँगी सँभलके
दे  ज्ञान दृष्टि
मिटे अज्ञान सारा
ऐसे मुझे मोह ना ।

कुण्डलियाँ 


(एक)

दिन ने खोले नयन जब ,बड़ा विकट था हाल ,
पवन,पुष्प,तरु ,ताल ,भू ,सबके सब बेहाल |
सबके सब बेहाल ,कुपित कुछ लगते ज्यादा ,
ले आँखों अंगार , खड़े थे सूरज दादा |

घोल रहा विष कौन .गरज कर जब वह बोले ,

लज्जित मन हैं मौन , नयन जब दिन ने खोले || 

                                                                                 
(दो)

नन्हीं बूँदें नाचतीं , ले हाथों में हाथ ,                              
पुलकित है कितनी धरा ,मेघ सजन के साथ |
मेघ सजन के साथ ,सरस हैं सभी दिशाएँ ,                              
पवन पत्तियों संग , मगन मन मंगल गाएँ |
अब अँगना के फूल , ठुमक कर नाचें कूदें ,
भिगो गईं मन आज , धरा संग नन्हीं बूँदें || 

जीवन में उत्साह से, सदा रहे भरपूर|
निर्मलता मन में रहे ,रहें कलुष से दूर||


डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 


एच -604 , प्रमुख हिल्स ,छरवाडा रोड
वापी ,जिला - वलसाड
गुजरात (भारत )
पिन - 396191
ईमेल:jyotsna.asharma@yahoo.co.in
sharmajyotsna766@gmail.com



डॉ.ज्योत्स्ना शर्मा



  • जन्म स्थान : बिजनौर (उ0प्र0)
  • शिक्षा : संस्कृत में स्नातकोत्तर उपाधि एवं पी-एच0डी0शोध विषय : श्री मूलशंकरमाणिक्यलालयाज्ञनिक की संस्कृत नाट्यकृतियों का नाट्यशास्त्रीय अध्ययन |
  • प्रकाशन : ‘यादों के पाखी’(हाइकु-संग्रह), ‘अलसाई चाँदनी’ (सेदोका –संग्रह ) एवं ‘उजास साथ रखना ‘(चोका-संग्रह) में स्थान पाया |
  • विविध राष्ट्रीय,अंतर्राष्ट्रीय (अंतर्जाल पर भी) पत्र-पत्रिकाओं ,ब्लॉग पर  यथा– हिंदी चेतना,गर्भनाल ,अनुभूति ,अविराम साहित्यिकी रचनाकार, सादर इंडिया,उदंती,लेखनी, यादें,अभिनव इमरोज़ ,सहज साहित्य ,त्रिवेणी ,हिंदी हाइकु ,विधान केसरी ,प्रभात केसरी ,नूतन भाषा-सेतु आदि में हाइकु,सेदोका,ताँका ,गीत ,कुंडलियाँ ,बाल कविताएँ ,समीक्षा ,लेख आदि विविध विधाओं में अनवरत प्रकाशन |
  •  संपर्क: H-604 ,प्रमुख हिल्स ,छरवाडा रोड, वापी जिला- वलसाड , गुजरात (भारत).पिन- 396191
  •  ईमेल: Jyotsna.asharma@yahoo.co.in
  • Sharmajyotsna766@gmail.com