सोमवार, 7 मार्च 2016

मैं ब्रह्मा हूँ एवं अन्य कविताएं-दिव्या माथुर


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


मैं ब्रह्मा हूँ



मैं ब्रह्मा हूँ
ये सारा ब्रह्मांड
मेरी ही कोख से जन्मा है
पाला है इसे मैंने
ढेर सा प्यार-दुलार देकर
और ये मेरे ही जाए
मेरी ही गोद का
बँटवारा करने पर तुले हैं
चिंदी चिंदी कर डाला है
मेरा आँचल
युद्ध चल रहा है 
मेरी ही गोद में
ग़रीबों को कुचल रहें हैं अमीर
कमज़ोरों को धमका रहे हैं बलशाली
मैं किसके संग रहूँ
या किसको सही कहूँ
जिसको भी समझाना चाहूँ
वह ही विरुद्ध हो जाता है
’बहकावे में आ जाती हूँ’
मुझपर इल्ज़ाम लगाता है
एक दिन मुझसे जगह पलटें
ता जानेंगे दुविधा माँ की
क्या सह पायेंगे पल भर भी
सतत वे पीड़ा ब्रह्मा की?


तेरे जाने के बाद..


जब तुम घर आते थे शाम को
दिल की धड़कन थम जाती थी
झट दौड़ के मुन्नी कमरे के
किसी कोने में छिप जाती थी
टूटे फूटे अब दरवाज़े
चौखट तो है खिड़कियाँ नहीं
टेढ़े मेढ़े बर्तन हैं बचे
मार नहीं झिड़कियाँ नहीं
आँखों के आगे धरती भी
न जाने कब से घूमी नहीं
न ही दिन को तारे दिखते हैं
अब नींद में डरके उठती नहीं
नन्हीं सी एक आहट पर 
अब दिल जाता है सिमट नहीं
लोगों से नज़र मिलाने में
अब होती कोई झिझक नहीं
अक्कड़ बक्कड़ से खेल हैं अब
न सही जो टूटे खिलौने नहीं
चेहरों पे हमारे शरारत है
उँगलियों के तेरी, निशान नहीं
सामान बिक गया सारा पर
घर भरा-भरा सा लगता है
भर पेट न चाहे खाया हो
मन हरा भरा सा रहता है।


बसंत


स्वर्णिम धूप, हरा मैदान
      पीली सरसों हुई जवान
              चुस्त हुआ, रंगों में नहा
                   लो देखो वयस्क हुआ उद्यान
झील में हैं कुछ श्वेत कमल
        या बादल नभ पर रहे टहल
                     मृदु गान से कोयल के मोहित
                                हैं नाच रहे मोरों के दल
यूँ पवन की छेड़ाछेड़ी से
            उद्विग्न हैं कालियाँ
                      फूलों का पा संरक्षण 
                                निश्चिंत हैं कालियाँ
फूलों से चहुं ओर घिरे
          भौंरे जैसे मद पान किए
                ख़याल तेरा भी भंग पिए
                              आया बसंत को संग लिए

मलबा


लगता है ये रौरव नर्क मुझे
हो रहा है तांडव अग्नि का
यह किसका हाथ
वह किसका पाँव
यह धूलधूसरित सिर
किसका
क्या इस कपाल के पिता हो तुम
बोलो इस धड़ की माँ है कौन
क्यूँ गले लगाते अपने नहीं
क्या सूँघ साँप कर गया मौन
इक जली हुई अँगुली में अँगूठी
किसी को तन्हा छोड़ गई है
किसी के जीवन की धारा का
सदा को रुख़ यह मोड़ गई है
इक युवती का डिज़ाइनर पर्स
निज होगा कभी, अब बिखरा पड़ा है
पाउडर, रूज और लिपस्टिक को
काजल ने अब हथिया लिया है
ख़ासा महँगा किसी का जूता
धुएँ में लिपटा उल्टा पड़ा है
बहुत ही जल्दी में वो होगा
नंगे पाँव जो चला गया है।

कसक


इधर भागी, उधर भागी
उछली कूदी, लपकी, लाँघी
काँपी, तड़पी, उलटी, पलटी
कटी पूँछ मरी औंधी
बेबस और बेकल छिपकली
कर्मों को अपने रोती रही

ज़ख़्म भर गया जल्दी ही
न और उसे कुछ याद रहा
न तो दर्द
न ही कोई सदमा
खालीपन था 

कुछ लमहों का
मन को जब समझा उसने लिया
तो निकल आई इक पूँछ नई
छोटी, मोटी बेहद भद्दी

कर्मों का रोना छोड़
हड़पती है वह अब नित
कीड़े मकौड़े ढेर कि
जाए उसकी कसक मिट


दिव्या माथुर




  • दिव्या माथुर का जन्म दिल्ली में हुआ और वहाँ से एम.ए. (अँग्रेज़ी) करने के पश्चात दिल्ली व ग्लास्गो से पत्रकारिता का डिप्लोमा किया। चिकित्सा-आशुलिपि का स्वतंत्र अध्ययन भी किया। 1985 में आप भारतीय उच्चायोग से जुड़ीं और 1992 से नेहरु केंद्र में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। उनका लंदन के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन में अपूर्व योगदान रहा है। रॉयल सोसाइटी ऑफ़ आर्ट्‌स की फ़ेलो हैं। नेत्रहीनता से सम्बन्धित कई संस्थाओं में इनका अभूतपूर्व योगदान रहा है। इसी विषय पर इनकी कहानियाँ और कविताएँ ब्रेल लिपि में प्रकाशित हो चुकीं हैं। आशा फ़ाउँडेशन और ‘पेन’ संस्थाओं की संस्थापक-सदस्य, चार्नवुड, आर्ट्‌स की सलाहकार, यू. के. हिंदी समिति की उपाध्यक्ष, भारत सरकार के आधीन, लंदन के उच्चायोग की हिंदी कार्यकारिणी समिति की सदस्या, कथा यू. के. की पूर्व अध्यक्ष और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन की सांस्कृतिक अध्यक्ष, दिव्या जी कई पत्र, पत्रिकाओं के सम्पादक मंडल में शामिल हैं। अंत:सलिला, रेत का लिखा, ख्याल तेरा और 11 सितम्बर: सपनों की राख तले (कविता संग्रह)। आक्रोश (कहानी संग्रह-प्रो. स्टुअर्ट मैक्ग्रेगर द्वारा विमोचित एवं पद्मानंद साहित्य सम्मान द्वारा सम्मानित), ओडेस्सी: स्टोरीज़ बाई इंडियन वुमैन राईटरज़ सेटलड एबरॉड (अंग्रेज़ी में संपादन, डा. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी द्वारा विमोचित) एवं आशा: स्टोरीज़ बाई इंडियन वुमैन राईटरज़ (अँग्रेज़ी में संपादन, साराह माईल्स द्वारा विमोचित) शीघ्र प्रकाश्य : ‘एक शाम भर बातें’ एवं ‘जीवन हा! मृत्यु‘। उनकी कहानियाँ और कविताएँ भिन्न भाषाओं के संकलनों में शामिल की गई हैं। आक्रोश, ओडेस्सी (सईद जाफरी द्वारा विमोचित) एवं आशा- तीनों संग्रहों के पेपरबैक संस्करण आ चुके हैं। जहाँ पॉल रौबसन द्वारा प्रस्तुत दिव्या माथुर के नाटक 'टेट-ए-टेट' की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई, वहीं उनकी दो अन्य कहानियों - ‘एक शाम भर बातें’ एवं ‘अपूर्व दिशा’ का भी सफल मंचन हो चुका है। रेडियो एवं दूरदर्शन पर इनके कार्यक्रम के नियमित प्रसारण के अतिरिक्त, इनकी कविताओं को कला संगम संस्था ने भारतीय नृत्य शैलियों के माध्यम से सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया।
  • राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सम्मानित एवं निमंत्रित, दिव्या जी को Arts Achiever-2003 Award (Arts Council of England), Indivi™als of Inspiration and Dedication ह्मonour (Chinmoy Mission) एवं संस्कृति सेवा सम्मान से अलंकृत किया जा चुका है।
  • लंदन में कहानियों के मंचन की शुरुआत का सेहरा भी आपके सिर जाता है। रीना भारद्वाज, कविता सेठ और सतनाम सिंह सरीखे विशिष्ठ संगीतज्ञों ने इनके गीत और ग़ज़लों को न केवल संगीतबद्ध किया, अपना स्वर भी दिया है।
  • सम्पर्क : DivyaMathur@aol.com


पुस्तक समीक्षा: कविता के गर्भ से-अरुण देव




                                  

                             आज हमारे बीच भर गई हैं खामोशियाँ..


कविता मनुष्यता की मातृभाषा है. कविता में ही वह अपने सुख-दुःख, यातनाएं, अनुभव दर्ज़ करता आया है. सामाजिक जटिलता बढ़ने से कवि-कर्म कठिन हुआ है. इसमें अब श्वेत-श्याम अनुभव नहीं होते. इसमें बहुत कुछ ‘ग्रे’ होता है. जिसे समझना धैर्य के साथ ही संभव है. दीर्घ परंपरा के कारण कविता में कुछ भी कहना भी बड़ी तैयारी की मांग करता है. जिस परंपरा में कालिदास, कबीर, ग़ालिब, प्रसाद और मुक्तिबोध हुए हों, जिसमें केदारनाथ सिंह और विष्णु खरे लिख रहे हों, उसमें कुछ भी अलहदा लिखना और अपनी पहचान सुनिश्चित करना आसान नहीं है. 

युवा कवि कुमार लव का पहला कविता संग्रह – ‘गर्भ में’ मेरे सामने हैं. कविताएँ 6  खंडों में विभक्त हैं. एक ही संग्रह में कविताओं के लिए 6 अलग-अलग खंड ऐसा संकेत करते हैं कि कवि अपने को अनुभवों में इतना विस्तृत पाता है कि उसे किसी एक शीर्षक में नहीं बाधा जा सकता. हालांकि कई बार ऐसे विभाजन एक रेटारिक की तरह लगते हैं और ऊब पैदा करते हैं. हिंदी कविता में प्रयोगशीलता की भी एक परंपरा है ओर प्रयोग के लिए भी परंपरा में दक्ष होना होता है. परंपराभंजक परंपराओं के साधक होते हैं.   

‘विसंवादी’ खंड के अंतर्गत ‘खामोशियाँ’ में कवि की कोशिशें रंग लाती हैं और ऐसा लगता है कि इसमें काव्याभास से आगे बढ़कर कुछ कहा गया है और सलीके से कहा गया है- 

“कभी हमें घेरे खड़ी थीं
आज हमारे बीच भर गई हैं
खामोशियाँ”

शब्दों का शूल बनना, शोर बनना और फिर अर्थहीन हो जाना अर्थगर्भित है. इसी खंड की अगली कविता भी सुखद अहसास है जब कवि सधे शिल्प में आज के क्षण-जीवी दर्शन को व्यक्त करता है-

‘पर,
पूर्णता 
एक क्षण से ज्यादा
कहाँ रहती है ?’ 

जटिल यांत्रिकता ने सहज मानवीयता के लिए जगहें नहीं छोड़ी हैं. एक सच्चा सीधा प्रेम भी अब सीधे ढंग से अभिव्यक्त नहीं हो सकता. शब्दों को दीमक लग गई है. कवि कहता है –

‘पर अब भी
चाहता हूँ थामना 
तुम्हारा हाथ,
छूना तुम्हारा मन,
कहना फिर से ..’

कविता की विश्वसनीयता के लिए यह जरूरी है कि वह कवि के जीवनानुभवों से निकले और फिर शिल्प में ढल जाए.प्रेम से संबंधित कविताओं में सच्चाई की एक महक है जो बरबस ध्यान खींचती हैं

‘प्रतीक्षा
तुम्हारे कमल से उठती
गंध की’

संवेदनशील मन अपने को ‘अनफिट’ पाता है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं. ‘एलिनियेशन’ इस सभ्यता की सबसे बड़ी बीमारी है. उत्पाद से उत्पादक का अपरिचय बढ़ते-बढ़ते हमारे संबंधों में घुस जाता है. और कई बार तो हम खुद से अपरिचित हो जाते हैं. प्रचार माध्यमों का दबाव एक नितांत ही बनावटी जीवनशैली के लिए बाध्य करता है. इसका बोझ सहन करते-करते आत्मा बीमार पड़ जाती है. कवि ईश्वर से कहता है-

‘ईश्वर,
गलती हो गई आपसे
दुनिया बनाई मेरे लिए
पर गलत नाप की’

कुछ कविताओं में बिंबों का प्रयोग सुंदर है और प्रभावशाली भी. ‘हे राम’ शीर्षक कविता में कवि कहता है-

‘शायद भूल गए हैं वे पिछले संग्राम
जिनमें खून बरसा था
गहरी नींद में सोए शहरों पर’ 

कुछ आकार में छोटी कविताएँ सुघड़ हैं और मन में बसी रह जाती हैं- 

‘कुछ भीगे ख्वाब थे
बिछाए थे सुखाने के लिए
कमरे भर में सीलन भर गई.’ 

डॉ देवराज के शब्दों में कहा जाए तो कविता में प्रयोगों की लाक्षणिकता के गहरे अर्थ हैं. कविताओं के चयन में और सावधानी की दरकार थी.

  • समीक्षित कृति : ‘गर्भ में’ / कुमार लव/ 2015/
  • तक्षशिला प्रकाशन, 98-ए, हिंदी पार्क, 
  • दरियागंज, नई दिल्ली - 110002/ 
  • पृष्ठ – 136/ मूल्य – रु. 300/- 

सोमवार, 18 जनवरी 2016

कुछ कविताएं काव्यकृति ‘सरहदें’ से-सुबोध श्रीवास्तव



विनोद शाही की कलाकृति


उसे आना ही है...


खोल दो
बंद दरवाजे/ खिड़कियां
मुग्ध न हो/ न हो प्रफुल्लित
जादू जगाते
दीपक के आलोक से।
निकलो
देहरी के उस पार
वंदन-अभिनंदन में
श्वेत अश्वों के रथ पर सवार
नवजात सूर्य के।
वो देखो-
चहचहाने लगे पंछी
सतरंगी हो उठीं दिशाएं
हां, सचमुच
कालिमा के बाद
आना ही है/ उसे
रश्मियां बिखेरकर
आल्हादित करने
विश्व क्षितिज को..!


जब, एक दिन


वहां, जहां खड़ा है
वह वृक्षमानव
आसपास बसती है
एक समूची दुनिया।
वृक्षमानव
बखूबी जानता है कि
कल, जब वह
जी भी नहीं पाया होगा
अपनी पूरी उम्र,
बांट न पाया होगा
सबको
ठंडी छांव,
सुन नहीं पाया होगा
जीभरकर किलकारियां
अपनी शाखों पर
इधर-उधर
नटखट बंदरों से झूलते
बच्चों की,
तभी-
उसके ही जिस्म के
एक हिस्से में जड़ी
कुल्हाड़ी थामे
कई जोड़ा हाथ
क्षण भर में मिटा देंगे
उसका अस्तित्व।
फिर कोई कारीगर
उसके शरीर को
कई हिस्सों में बांटकर
बनाएगा
आधुनिक शैली में
फर्नीचर के उत्कृष्ट नमूने-
जिन पे बैठकर बनेंगी
पर्यावरण रक्षा की
अनेक योजनाएं।
फिर भी वह
विस्मृत नहीं कर पाता
आदमियत के साथ अपना रिश्ता
क्योंकि-
वह यह भी जानता है कि
आधुनिकता की दौड़ में
बदहवास सा भागता आदमी
जब हर कहीं मिटा चुका होगा
हरियाली का अस्तित्व
किसा रोज/शाम को
कंकरीट के जंगल से उकताकर
वापस लौटने पर
उसका बच्चा
रोपता मिलेगा/एक नन्हा पौधा
तब उसे, अचानक याद आयेगा
बचपन में-
खुद का पेड़ों पर झूलना
और वह
सहमे से बच्चे को
पुचकार कर उठा लेगा गोद में।


वर्षा: एक शब्दचित्र


गली के नुक्कड़ पे 
बारिश की रिमझिम के बाद 
उस छोर से आती 
छोटी सी नदी में 
छपाक-छपाक करते 
अधनंगे बच्चे,
डगमगाकर आतीं 
कागज़ की छोटी-छोटी कश्तियां
पल भर को ताजा कर गईं
स्मृतियां-
घर/बचपन की।
घर और बचपन
दोनों ही पर्यायवाची शब्द हैं
अस्थायित्व के 
बचपन-
हमेशा पास नहीं रहता
सरक जाता है घुटनों के बल
जाने कब?
और घर भी 
हमेशा 'घर' होने का एहसास
नहीं दिलाता 
हर किसी को।


आज भी


आज फिर
मचल गया
देहरी पे पांव रखता
नन्हा बच्चा।
एक पल ठिठक कर
कल मिली
पिता की डांट याद करता है
फिर, हौले से पुचकार कर
ज़मीन पे रेंगते
जहरीले कीड़े को-
सूखे पेड़ के सुपुर्द करते हुए
क्लास में
टीचर के पढ़ाए सबक को
कार्यरूप देता है।
बच्चा/कीड़ा/पेड़
तीनों-
एक दूसरे के कोई नहीं
शायद इसीलिए
अब भी सांस ले रही है
मानवता..!


उम्मीद का दायरा


जहां खत्म होता है
उम्मीद का दायरा
वहीं से करो/ तुम
इक नई शुरुआत।
याद रखना-
हर शुरुआत
लबरेज़ होती है
ताज़ातरीन उम्मीदों से
जिसमें/ नाउम्मीदी की
कोई गुंजाईश नहीं होती
और
उम्मीद पे
दुनिया कायम है..!
(रचनाएं काव्य संग्रह 'सरहदें' से)

सुबोध श्रीवास्तव


'माडर्न विला', 10/518,
खलासी लाइन्स,कानपुर (उप्र)-208001.
मो.09305540745
ई-मेल: subodhsrivastava85@yahoo.in



सुबोध श्रीवास्तव


  • जन्म: 4 सितम्बर, 1966 (कानपुर)
  • मां: श्रीमती कमला श्रीवास्तव
  • पिता: स्व.श्री प्रेम नारायण दीवान
  • शिक्षा: परास्नातक
  • व्यवसाय: पत्रकारिता (वर्ष 1986 से)। 'दैनिक भास्कर', 'स्वतंत्र भारत' (कानपुर/लखनऊ) आदि में विभिन्न पदों पर कार्य।
  • विधाएं: नई कविता, गीत, गजल, दोहे, मुक्तक, कहानी, व्यंग्य, निबंध, रिपोर्ताज और बाल साहित्य। रचनाएं देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं,प्रमुख अंतरजाल पत्रिकाओं में प्रकाशित। दूरदर्शन/आकाशवाणी से प्रसारण भी।
  • प्रकाशित कृतियां:
  • 'पीढ़ी का दर्द' (काव्य संग्रह)
  • 'ईष्र्या' (लघुकथा संग्रह)
  • 'शेरनी मां' (बाल कथा संग्रह)
  • 'सरहदें' (काव्य संग्रह)
  • विशेष: काव्यकृति 'पीढ़ी का दर्द' के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा पुरस्कृत।
  • साहित्य/पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा 'गणेश शंकर विद्यार्थी अतिविशिष्ट सम्मान'।
  • कई अन्य संस्थाओं से भी सम्मानित।
  • संपादन: 'काव्ययुग' ई-पत्रिका
  • संप्रति: 'आज' (हिन्दी दैनिक), कानपुर में कार्यरत।
  • संपर्क: 'माडर्न विला',10/518, खलासी लाइन्स, कानपुर (उ.प्र.)-208001, उत्तर प्रदेश (भारत)।
  • मोबाइल: 09305540745/9839364419
  • फेसबुक:www.facebook.com/subodhsrivastava85
  • ट्विटर:www.twitter.com/subodhsrivasta3
  • ई-मेल: subodhsrivastava85@yahoo.in





  • पुस्तक-सरहदें/ कविता संग्रह
  • कवि-सुबोध श्रीवास्तव
  • पृष्ठ-96
  • मूल्य-120 रुपये 
  • बाईंडिंग-पेपरबैक
  • प्रकाशक-अंजुमन प्रकाशन, 
  • 942 मुट्ठीगंज, इलाहाबाद, 
  • उत्तर प्रदेश (भारत)
  • मोबाइल: +91-9453004398
  • ISBN12: 9789383969722
  • ISBN10: 9383969722
  • http://www.anjumanpublication.com

सोमवार, 21 दिसंबर 2015

दो कविताएं-पुष्पराज चसवाल


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



जीवन-ज्योति 


आओ
हम उन्हें
एक और ज़िन्दगी की
राह दिखाएँ
उन्हें
जो जीने के रास्ते
भूल चुके हैं या
बंद समझ चुके हैं,
आओ
हम उन्हें
बताने की कोशिश करें
जीवन-ज्योति
क्रिश्चन कैलेंडर में
या
विक्रमी संवत में
क़ैद, मापदंड नहीं
जीवन-ज्योति
अखंड ज्योति है
सहस्र सूर्यों से परे
क्षितिज की सभी
सीमाओं के पार
अलौकिक नृत्य में
मगन, पार
मानवीय पकड़ के।


दिशा-ज्ञान 


ओ धरा के जीव,
युगों से बनकर व्योम-पक्षी
व्योम-फूल से बातें करते -
थके नहीं हो क्या?

आदिकाल से
अंतकाल तक
विचरते
एक छोर से
सहस्र छोर तक भटकते
है कौन
चिरंतन सत्य
या विलक्षण सत्ता
तुमने जाना?

खो जाने में,
जो मिलता है -
देख चुके हो!
पा जाने में,
क्या मिलता है-
कैसे जानो?

मानव हो तुम,
मानवी है धरा।
लिए कर में -
अमृत-कलश,
कब से तुम्हें पुकारती
अंतरंग निहारती,
पालकी सजी-सजी,
आ रही पहचान-सी,

भ्रम को छोड़ो!
लौट भी आओ
इस धरती से
नाता जोड़ो।
युगों से जिसको
ढूंढ रहे हो,
पा जाओगे
क्षण भर में ही,
वह अमरत्व -
वह दुर्लभ जीवन रस।



पुष्प राज चसवाल


  • जन्म तिथि: 1944-06-13
  • जन्म स्थान: गाँव ददवाल, ज़िला रावलपिंडी (अब पाकिस्तान में)
  • शिक्षा: B.A., M.B.A.
  • प्रकाशित कृतियाँ: "दिशाएं" (काव्य- संग्रह, १९९१), "संवेदनाओं के घेरे" (काव्य -संग्रह, २००१) "कर्म-क्षेत्र" (उपन्यास, २००९)
  • लेखन: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियां निरंतर प्रकाशित मुख्यतः हरिगंधा (पंचकूला, हरियाणा), शब्द सरोकार (पटियाला,पंजाब) इंगित (ग्वालियर, मध्य प्रदेश), सफ़र ज़ारी है (तश्नगाने-अदब, दिल्ली),  पुष्पगन्धा (अम्बाला,हरियाणा), वीर प्रताप (जालंधर,पंजाब), दैनिक ट्रिब्यून (चंडीगढ़, यू टी);
  • पी.पी. प्रकाशन द्वारा ६ किताबों के प्रकाशन में सक्रिय भूमिका; हिंदी के त्रैमासिक ई-पत्रिका 'अनहद कृति' (www.anhadkriti.com) में सक्रिय लेखन एवं सम्पादन।
  • जालघर पर 'स्वर्गविभा' में कविताएं।
  • सम्प्रति: बैंक ऑफ़ बड़ोदा से २००१ में प्रबंधक पद से अवकाश-प्राप्त; पी. पी. प्रकाशन में मुख्य-संस्थापक; वर्ष २०१३ में जीवनसंगिनी डॉ प्रेम लता चसवाल 'प्रेम पुष्प'  के साथ पी.पी.प्रकाशन (अम्बाला, शहर) के अंतर्गत - हिंदी साहित्य, कला एवं सामजिक सरोकारों की ई-पत्रिका 'अनहद-कृति' की संस्थापना और अब 'अनहद कृति' ई-त्रैमासिकी में सक्रीय लेखन एवं सह-सम्पादन।
  • रुचियाँ: इतिहास पठन, साहित्य पठन-पाठन, वाद-विवाद, काव्य पाठ, और नाट्य मंचन के साथ राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सरोकारों के बारे में जानकारी पाने में गहरी रूचि; महत्वपूर्ण ऐतिहासिक हस्तियों के भाषणों का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद। 
  • सम्मान: तीसरी कक्षा में ही १९५३ (1953) में प्रधान-मंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू व इंगलैंड के प्रधान-मंत्री हेराल्ड मैकमिलन के समक्ष 'आदर्श ग्राम'  में लघु नाटिका में नायक की भूमिका, चौथी कक्षा से लेकर स्नातक की परीक्षाओं में उत्कृष्टता छात्रवृत्ति से सम्मानित, कॉलेज के दिनों में यूथ-फेस्टिवल एवं अंतर-महाविद्यालय काव्य-पाठ, भाषण प्रतियोगिताओं व नाट्य-मंचन में कई बार प्रथम पुरस्कार, विशेषकर उल्लेखनीय है वर्ष १९६५ में बटाला में आयोजित अंतर-महाविद्यालय काव्य-पाठ प्रतियोगिता में पंजाबी के कवि शिरोमणि शिव कुमार बटालवी द्वारा पुरस्कृत, पंजाब विश्वविद्यालय, यूथ वेलफेयर विभाग द्वारा आयोजित प्रशिक्षण-कैम्प के बाद कॉलेज में यूथ लीडरशिप ऐसोसिएशन (वाई.एल ए) के संस्थापक प्रधान १९६५ (1965),  बैंक ऑफ़ बड़ोदा, दिल्ली अंचल द्वारा हिंदी-दिवस पर आयोजित समारोह में लगातार तीन वर्ष तक अनुवाद में प्रथम पुरस्कार १९८४-८६ (1984-86); "दिशाएं" १९८८ (1988)एवं "संवेदनाओं के घेरे" २००१ (2001) का प्रकाशन हरियाणा साहित्य अकादमी के सहयोग से; हरियाणा साहित्य अकादमीद्वारा आयोजित हरियाणा भ्रमण यात्रा में अम्बाला के प्रतिनिधि रचनाकार के रूप में प्रतिनिधित्व, बैंक ऑफ़ बड़ोदा कर्मचारी संगठन (पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर,चंडीगढ़ क्षेत्र) में पंद्रह वर्ष तक प्रधान एवं महासचिव के रूप में सक्रिय भूमिका;  वर्ष १९७०-८० (1970 -80) के दशक में गुड़गांव में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों में सक्रिय भूमिका, वर्ष १९७०-८० (1970-80) व १९८०-९० (1980-90) में गुडगाँव, करनाल, अम्बाला में कई श्रमिक संगठनों में भागीदारी; कर्मचारी संगठन सभाओं में प्रभावशाली वक्ता; २००५ (2005) में यूनिवर्सिटी ऑफ़ विस्कॉन्सिन (संयुक्त राज्य अमरीका) में आयोजित "कांफ्रेंस ओन साउथ एशिया" में "लिट्रेसी इंक्रीज़िज़ द पेस ऑफ़ डेवेलपमेंट: एन इंडियन एग्ज़ाम्पल" वार्ता में मुख्य वक्ता; ऑल इंडिया रेडियो शिवपुरी, ग्वालियर (मध्य प्रदेश) तथा कुरुक्षेत्र (हरियाणा) से काव्य-पाठ एवं वार्ता का प्रसारण।
  • ईमेल: prchaswal@gmail.com

सोमवार, 7 दिसंबर 2015

मुकम्मल घर व अन्य कविताएं- डॉ सुधा उपाध्याय


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


             मुकम्मल घर



                बहुत सी उम्मीदों का असबाब बांधकर ,

                अम्मा मैंने एक घर बनाया है ...

                रहूंगी मैं वहां तुम्हारे साथ ,

                रहेगी मेरी बिटिया वहीं मेरे साथ

                घर के बाहर लगी होगी तख्ती तुम्हारी नातिन की

                अम्मा मैंने एक घर सजाया है...

                सजेगी फर्श तुम्हारी निश्छल मुस्कराहट से

                रंगेगी हर दीवार हमारे कहकहों से

                लगाउंगी घर के कोनों में बड़ा सा आइना

                जहाँ दिखेंगे हमें हमारे पुरुष

                अम्मा मैंने एक घर बसाया है ....

                आसमान की अलगनी पर सुखाउंगी तुम्हारी धोती

                अपनी सलवार कमीज़ और बिटिया की शर्ट पैंट

                आँगन में बिराजेंगे तुम्हारे शालिग्राम भगवान्

                रंसोयी में महकेगा सालन तुम्हारे हाँथ का

                छत पर सुखायेंगे हम अपने अपने आंसू

                बस तुम लौट आवो अम्मा ,...

                हम भी बना सकती हैं

                सजा सकती हैं

                बसा सकती हैं

                एक मुकम्मल घर

                   

             बुरा हुआ,...जो,...सो हुआ



                अब इस से बुरा और क्या होगा ?

                कि नन्हीं चिर्रैया अपने ही रंग रूप से

                है इन दिनों परेशान

                अपने हर हाव भाव पर ,

                फुदक चहक पर हो रही है सावधान

                उसने ,खुदने अपने दाने चुगने ,

                आँगन आँगन ,फुर्र फुर्र

                उड़ने पर लगा ली है पाबंदी

                समेट ली है अपनी हर मोहक अदा.....

                बेपरवाह पंखों को समेट

                उड़ जाना चाहती है नन्हीं चिर्रैया....

                तिनके तिनके जोड़ कर

                नहीं बसना चाहती कोई घोंसला

                आंधी तूफ़ान ,तेज़ बारिश से भी

                ज्यादा डरने लगी है

                उन बहेलियों से जो पुचकार कर दाना खिलते हैं

                रंग बिरंगी बर्ड हाउस तंग देते हैं रेलिंगों पर

                वहां कोई आशियाना नहीं बसना चाहती

                नन्हीं चिर्रैया

                फुसलाने ,बहलाने के सम्मोहन से

               आज़ाद होना चाहती है नन्हीं चिर्रैया

                डरने लगी है बेहिसाब अपने ही रंग रूप

                घाव भाव फुदक चहक...

                हर अदा पर अब नन्हीं चिर्रैया ...

                 
            

             आखिर कब



                एक ही सपना देखती हूँ आजकल

                मैं एक नन्हे बच्चे में तब्दील हो चुकी हूँ

                हाँथ में कूची और रंग लिए

                हंस हंस कर मैंने नीले नीले

                पहाड़ रंग डाले

                आकाश पर समुद्र और धरती पर

                सूरज उतार लायी

                सारे पंछी ज़मीन पर रेंगने लगे

                हांथी घोड़े ऊंट उड़ने लगे

                चंदा मामा नदी में नहा रहे थे

                सूरज चाचू कपडे धोने लगे

                आकाश में हरी हरी दूब उग आई

                वहां रेत थी, ईंटें भी, झोपड़ियाँ भी

                बहुत उड़ने वालों को अपनी औकात समझ में आरही थी

                सारे बच्चों की गेंदें आकाश में उछाल रही थीं

                चलो मैदान ना सही आकाश तो था खेलने की खातिर

                पर नींद यहीं आकर खुल जाती है ....

                आखिर कब सपना पूरा होगा?

  .

क्या आप जानते हैं..?



पिंजरा भर देता है मन में अनंत आकाश ,

हर बंधन से मु क्ति की छट पटा हट

जड़ता और रिवायतों से विरोध भाव ,

समस्त सुकुमार कोमल समझौतों के प्रति घृणा

यह तो पिंजरे में बंद चिरिया से पूछो ,

क्यूंकि वही जानती है आज़ादी के सही मायने

वो तरस खाती है उस आज़ाद चिरिया पर

जो कोमल घास पर फुदक फुदक कर

छोटे छोटे कीड़े मकौडों को आहार बनाती है

आज़ादी के सच्चे अर्थ नही जानती

और लम्बी तान गाती है ,

अपने में मशगूल

अपना आस पास भुला  देती है

उसके गीत में राग अधिक है वेदना कम

वह अपनी मोहक आवाज़ से

मूल मंत्र भी बिसरा देती है

यहाँ पिंजरे में बंद चिरिया की तान

दूर दूर चट्टानी पहाड़ों को भी

दरका सकती है

उसके गीत में दर्द से बढ़कर कुछ है

जिसे समझ सकती है

केवल पिंजरे की चिरिया...


अम्मा



मेरी हर वो जिद नाकाम ही रही

जो तुम्हारे बिना सोने जागने उगने डूबने

बुनने बनाने बड़े होने या.... 

सब कुछ हो जाने की थी

अब जैसे के तुम नहीं हो कहीं नहीं हो

कुछ नहीं हो पाता तुम्हारे बगैर

नींदों में सपनो का आना जाना

जागते हुए नयी आफत को न्योता देना

चुनौतियों को ललकारना

अब मुनासिब नहीं .


सहेज कर रखा है..



मैंने आज भी सहेज कर रखा है

वह सबकुछ जो अम्मा ने थमाई थी

घर छोड़ कर आते हुए

तुम्हारे लिए अगाध विश्वास

सच्ची चाहत ,धुले पूछे विचार

संवेदनशील गीत ,कोयल की कुहुक

बुलबुलों की उड़ान ,ताज़े फूलों की महक


तितली के रंग ,इतर की शीशी

कुछ कढाई वाले रुमाल

सोचती हूँ हवाई उड़ान भरते भरते

जब तुम थक जाओगे

मैं इसी खुरदुरी ज़मीन पर तुम्हे फिर मिल जाउंगी

जहाँ हम घंटों पसरे रहते थे मन गीला किये हुए

वे सब धरोहर दे दूँगी ख़ुशी से वे तुम्हारे ही थे

अक्षत तुम्हारे ही रहेंगे ....



डॉ सुधा उपाध्याय


बी-3, स्टाफ क्वार्टर्स,

जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज (दि.वि.वि),

सर गंगाराम अस्पताल मार्ग,

ओल्ड राजेंद्र नगर,

नई दिल्ली-110060

फोन-09971816506



डॉ सुधा उपाध्याय



कई विधाओं में स्वतंत्र लेखन करती रही हैं। समसामयिक अनेक प्रतिष्ठित
पत्र-पत्रिकाओं में कई आलेख, कहानी, कविताएं प्रकाशित और पुरस्कृत।
विश्वविद्यालय स्तर पर कई पुरस्कार भी अर्जित किए हैं। अध्ययन-अध्यापन के
अलावा अनेक गोष्ठियों, परिचर्चाओं और वाद-विवाद में सक्रिय भागीदारी रही
सुल्तानपुर (उ.प्र.) में जन्मी डॉ सुधा उपाध्याय गद्य और पद्य दोनों है। ‘
बोलती चुप्पी’ (राधाकृष्ण प्रकाशन) कविताओं का संकलन बेहद चर्चित
रहा है। समकालीन हिंदी साहित्य, साक्षात्कार, कथाक्रम, आलोचना,
इंद्रप्रस्थ भारती, सामयिक मीमांसा आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं
प्रकाशित। दिल्ली विश्वविद्यालय के जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज में हिंदी
विभाग की वरिष्ठ व्याख्याता के रुप में कार्यरत हैं। हाल ही में प्रकाशित
पुस्तक ‘हिंदी की चर्चित कवियित्रियां’ नामक कविता संकलन में कविताएं
प्रकाशित हुई हैं।

पुस्तक चर्चा: सपने ऒर आत्म भरोसे की कविताएं: 'सरहदें' -दिविक रमेश



       

                             'सरहदें' (कविता-संग्रह)-सुबोध श्रीवास्तव 


    कवि सुबोध श्रीवास्तव की कविताएं गाहे-बगाहे पढ़ता रहा हूं। अपने दूसरे कविता-संग्रह 'सरहदें' की पांडुलिपि भेजते समय उन्होंने अपने पहले प्रकाशित संग्रह 'पीढ़ी का दर्द' की प्रति भी भेज दी। उनके संग्रहों ऒर कविताओं को पढ़ते समय यह जानकर अच्छा लगा कि सुबोध मात्र कवि ही नहीं बल्कि एक सजग पत्रकार ऒर कहानी, व्यंग, निबंध आदि विधाओं के भी लेखक हॆं। इससे उनकी बहुविध प्रतिभा का भी पता चलता हॆ ऒर अनुभव के दायरे का भी। अच्छा यह जानकर भी लगा कि उनके पहले ही संग्रह की कविताओं ने उन्हें डा.गिरिजा शंकर त्रिवेदी, कृष्णानन्द चॊबे, डॉ. यतीन्द्र तिवारी, गिरिराज किशोर ऒर् नीरज जॆसे प्रशंसक दिला दिए। अत: कानपुर के इस कवि को प्रारम्भ में ही प्रयाप्त प्रोत्साहन ऒर स्नेह मिल गया। डॉ. यतीन्द्र ने पत्रकार होने के नाते सुबोध की सामाजिक सहभागिता को रेखांकित किया हॆ। साथ ही उनकी रचनाओं में व्यक्ति की संवेदनाओं का सार्थक साक्षात्कार भी निहित माना हॆ। तमाम कविताओं को पढ़कर एक बात तो सहज रूप में सिद्ध हो जाती हे कि इस कवि का मिजाज सोच या कला के उलझावों का नहीं हॆ। जब जो अनुभव में आया उसकी सहज ऒर सच्ची अभिव्यक्ति करने में इसे एकदम गुरेज नहीं हॆ। वस्तुत: यह कवि अपनी धुन का पकका लगता हॆ--कुछ-कुछ अपनी राह पर, अपनी मस्ती में चलने का कायल। सबूत के लिए, पहले संग्रह में उनकी  एक कविता हॆ- कविता के लिए। कविता यूं हॆ- तुम,/ अपनी कुदाल/चलाते रहो,/ शोषण की बात सोचकर/रोकना नहीं/अपने-/यंत्रचालित से हाथ/वरना,/मॊत हो जाएगी/कविता की। इस सोच के कवि के पास आत्म भरोसा, सपना ऒर कभी-कभी अपने भीतर भी झांकने ऒर कमजोरियों को उकेरने का माद्दा हुआ करता हॆ। वह झूठी ऒर भावुक आस बंधाने से भी बचा करता हॆ। यथार्थ का दामन न छोड़ता हॆ ऒर न छोड़ने की सलाह देता हॆ।यथार्थ कविता की ये पंक्तियां पढ़ी जा सकती हॆं-पहाड़ से टकराने का/तुम्हारा फॆसला/अच्छा हॆ/शायद अटल नहीं/क्योंकि/कमज़ोर नहीं होता/पहाड़,/न ही अकेला/ उस तक पहुंचते-पहुंचते/कहीं तुम भी,/शामिल हो जाओ/उसके-/प्रशंसक की भीड़ में। अच्छी बात हॆ कि दूसरे संग्रह तक पहुंचकर भी इन बातों से कवि ने मुंह नहीं मोड़ा हॆ।

    'सरहदें' की कविताएं नि:संदेह कवि का अगला कदम हॆ। यह संग्रह अनुभव की विविधता से भरा हॆ, लेकिन दृष्टि यहां भी कुल मिलाकर सकारात्मक हॆ। वस्तुत: कवि के पास एक ऎसी अहंकार विहीन सहज ललक हॆ, बल्कि कहा जाए कि सक्रिय जीवन की सहज समझ हॆ जो उसे लोगों से जुड़े रहने की उचित समझ देती हॆ--हमें मिलकर/ बनानी हॆ/ इक खूबसूरत दुनिया/ हां, सहमुच/बगॆर तुम्हारे/ यह सब संभव भी तो नहीं। इस कवि में अपनी राह या प्रतिबद्धता को लेकर कोई दुविधा नहीं हॆ-मॆं घुलना चाहता हूं/खेतों की सोंधी माटी में/गतिशील रहना चाहता हूं/ किसान के हल में/ खिलखिलाना चाहता हूं/ दुनिया से अनजान/खेलते बच्चों के साथ/हां, चहचहाना चाहता हूं/सांझ ढले/घर लॊटते/पंछियों के संग-संग/चाहत हॆ मेरी/कि बस जाऊं वहां-वहां/जहां/सांस लेती हॆ जिन्दगी। अनेक कविताएं ऎसी हॆं जो उम्मीद ऒर आत्मविश्वास की अलख को जगाने का काम करती हॆं। यह काम इसलिए ऒर भी महत्त्व का हो जाता हॆ क्योंकि कवि यथार्थ के कटु पक्ष से अपरिचित नहीं हॆ। मोहभंग की स्थितियों से भी अनजान नहीं हॆ। तभी न यह समझ उभर कर आ सकी हॆ -लॊट भले ही आया हूं/मॆं/लेकिन/हारा अब भी नहीं। वस्तुत:, इस संदर्भ में संकलन की एक अच्छी कविता फिर सृजन को भी पढ़ा जाना चाहिए। यह कवि सपने के मूल्य को भी स्थापित करता हे क्योंकि सपने-/जब भी टूटते हॆं/"लोग"/ अक्सर दम तोड़ देते हॆं। ऒर यह भी-उम्मीदें हमेशा तो नहीं टूटतीं।यह कवि बार बार बच्चे अथवा बच्चे की मासूमियत की ओर लॊटता हॆ क्योंकि बच्चा ही हॆ जो अपने को तहस-नहस की ओर ले जाती मनुष्यता को बचा सकता हॆ। इस दृष्टि से जब एक दिन कविता पढ़ी जा सकती हॆ। सरहदें पांच की ये पंक्तियां ऒर भी गहरे से इसी भाव को बढ़ाते हुए अपनी-अपनी, तरह-तरह की सरहदों में कॆद हो चुके मनुष्य की संवेदना को झकझोर सकती हॆं--विश्वास हॆ मुझे/ जब किसी रोज़/ क्रीडा में मग्न/ मेरे बच्चे/ हुल्लड़ मचाते/ गुजरेंगे करीब से/ सरहद के/ एकाएक/ उस पार से उभरेगा/ एक समूह स्वर/ "ठहरो!"/ खेलेंगे हम भी/ तुम्हारे साथ.../ एक पल को ठिठकेंगे/फिर सब बच्चे/ हाथ थाम कर/ एक दूसरे का/ दूने उल्लास से/ निकल जाएंगे दूर/ खेलेंगे संग-संग/ गांएंगे गीत/प्रेम के, बंधुत्व के/ तब न रहेंगी सरहदें/ न रहेंगी लकीरें/ तब रहेंगी/ सिर्फ..सिर्फ...सिर्फ.। संग्रह की एक
विशिष्टता इसमें संकलित 'सरहदें' शीर्षक से 11 कविताएं भी हॆं। कहीं- कहीं कवि दार्शनिक होकर भीतरी सत्य को उकेरता भी नजर आता हॆ, जॆसे 'अंतर' कविता में।  कोमल निजी एहसासों कि कुछ कविताएं, जॆसे एहसास, इंतज़ार आदि कविताएं भी पाठकों का ध्यान खींच सकती हॆं। पाठक पाएंगे कि अपनी भाषा पर कवि कोई अतिरिक्त मुलम्मा नहीं चढ़ाता। यूं कुछ खूबसूरत बिम्ब आदि पाठक को सहज ही सहभागी बनाने में समर्थ हॆं--लेकिन/ खिड़की पर/ बॆठे धूप के टुकड़े से/नहाया/ सफ़ेद कबूतरों का जोड़ा।

    यहां मॆंने कुछ ही कविताओं के माध्यम से पाठकों को इस संकलन के पढ़े जाने की जरूरत को रेखांकित किया हॆ। मुझे विश्वास हॆ इस संग्रह की कविताएं अपने पाठकों को अपना उचित भागीदार बनाने में समर्थ सिद्ध होंगी।

दिविक रमेश


बी-295, सेक्टर -20,
नोएडा-201301



  • पुस्तक-सरहदें/ कविता संग्रह
  • कवि-सुबोध श्रीवास्तव
  • पृष्ठ-96
  • मूल्य-120 रुपये 
  • बाईंडिंग-पेपरबैक
  • प्रकाशक-अंजुमन  प्रकाशन, इलाहाबाद
  • ISBN12: 9789383969722
  • ISBN10: 9383969722
  • http://www.anjumanpublication.com

सोमवार, 23 नवंबर 2015

अशोक अंजुम की ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


(एक)


खाना- पीना, हंसी-ठिठोली , सारा कारोबार अलग !
जाने क्या-क्या कर देती है आँगन की दीवार  अलग !

पहले इक छत के ही नीचे  कितने उत्सव होते थे,

सारी खुशियाँ पता न था यूँ कर देगा बाज़ार  अलग !

पत्नी, बहन, भाभियाँ, ताई, चाची, बुआ, मौसीजी

सारे रिश्ते एक तरफ हैं लेकिन माँ का प्यार  अलग !

कैसे तेरे - मेरे रिश्ते को मंजिल मिल सकती थी

कुछ तेरी रफ़्तार अलग थी, कुछ मेरी रफ़्तार अलग !

जाने कितनी देर तलक दिल बदहवास-सा रहता है

तेरे सब इकरार अलग हैं, लेकिन इक इनकार  अलग !

अब पलटेंगे,  अब पलटेंगे, जब-जब ऐसा सोचा है

'अंजुम जी' अपना अन्दाज़ा हो जाता हर बार  अलग !


(दो) 


झिलमिल-झिलमिल जादू-टोना पारा-पारा आँख में है
बाहर कैसे धूप खिलेगी जो अँधियारा आँख में है

यहाँ-वहाँ हर ओर जहाँ में दिलकश खूब नज़ारे हैं

कहाँ जगह है किसी और को कोई प्यारा आँख में है

एक समन्दर मन के अन्दर उनके भी और मेरे भी

मंज़िल नहीं असंभव यारो अगर किनारा आँख में है

परवत-परवत, नदिया-नदिया, उड़ते पंछी, खिलते फूल

बाहर कहाँ ढूँढते हो तुम हर इक नज़ारा आँख में है

चैन कहाँ है, भटक रहे हैं कभी इधर तो कभी उधर

पाँव नहीं थमते हैं ‘अंजुम’ इक बंजारा आँख में है


(तीन)


बड़ी मासूमियत से सादगी से बात करता है
मेरा किरदार जब भी ज़िंदगी से बात करता है

बताया है किसी ने जल्द ही ये सूख जाएगी

तभी से मन मेरा घण्टों नदी से बात करता है

कभी जो तीरगी मन को हमारे घेर लेती है

तो उठ के हौसला तब रौशनी से बात करता है

नसीहत देर तक देती है माँ उसको ज़माने की

कोई बच्चा कभी जो अजनबी से बात करता है

मैं कोशिश तो बहुत करता हूँ उसको जान लूँ लेकिन

वो मिलने पर बड़ी कारीगरी से बात करता है

शरारत देखती है शक्ल बचपन की उदासी से

ये बचपन जब कभी संजीदगी से बात करता है


(चार)


सबको चुभती रही मेरी आवारगी
मुझमें सबसे भली मेरी आवारगी

रंग सारे सजाकर विधाता ने तब

रफ़्ता-रफ़्ता रची मेरी आवारगी

वक़्त ने यूँ तो मुझसे बहुत कुछ लिया

जाने क्यों छोड़ दी मेरी आवारगी

ज़ुल्मतें-जु़ल्मतं हर तरफ ज़ुल्मतें

चाँदनी-चाँदनी मेरी आवारगी

ज़िन्दगी की डगर में जो काँटे चुभे

बन गई मखमली मेरी आवारगी

हादसों ने कसर कोई छोड़ी नहीं

मेरी रहबर बनी मेरी आवारगी

धूप में, धुन्ध में, तेज बरसात में

कब थमी, कब रुकी मेरी आवारगी


(पांच) 


कोई राजा नहीं, कोई रानी नहीं
ये कहानी भी कोई कहानी नहीं

आम जनता के सपनों का मक़तल है ये

दोस्तो ये कोई राजधानी नहीं

ये जो ख़ैरात है इसको रह ने ही दो

हमको हक़ चाहिए मेहरबानी नहीं

अश्क हों आह हों जिसमें मज़लूम की

ऐसी दौलत हमें तो कमानी नहीं

कंकरीटों की फसलें उगीं चारसू

रंग धरती का पहले सा धानी नहीं

जिनमें हो न ज़रा भी जिगर का लहू

ऐसे  शेरों के कोई भी मानी नहीं

एक बेदम नदी पूछती है मुझे

तेरी आँखों में क्यूँ आज पानी नहीं

डूबना लाज़मी था तेरी नाव का

बात पतवार की तूने मानी नहीं


(छह) 


ये सारा आलम महक रहा है, चला ये किसके हुनर का जादू
कि रफ़्ता-रफ़्ता शबाब पर है, किसी की खिलती उमर का जादू

मैं कौन हूँ, कुछ पता नहीं है, कि होश  मेरे उड़े हुए हैं

चलाया किसने ये मुस्कुराकर यूँ अपनी तिरछी नज़र का जादू

धरा जले है, गगन जले है, सुलग रहा है समूचा आलम

कि ऐसे में भी बिखर रहा है ये खूब इक गुलमुहर का जादू

ये मन में हलचल-सी हो रही है, खनक रहे हैं किसी के कंगन

नशे में मुझको डुबोता जाये वो कँपकँपाते अधर का जादू


अशोक अंजुम 


संपादक : अभिनव प्रयास ( त्रेमासिक )
स्ट्रीट २, चन्द्र विहार कॉलोनी (नगला डालचंद),
क्वार्सी बाई पास,अलीगढ 202001 (उ -प्र.)
मो. ०९२५८७७९७४४,०९३५८२१८९०७




अशोक ‘अंजुम’

(अशोक कुमार शर्मा)


  • जन्मदिन- 15 दिसम्बर 1966 (माँ ने बताया), 
  • 25 सितम्बर 1966 (काग़ज़ों पर)
  • काग़ज़ी शिक्षा - बी.एससी.,एम.ए.(अर्थशास्त्र, हिन्दी),बी.एड.
  • लेखन-विधाएँ - मुख्यतया गज़ल, दोहा, गीत, हास्य-व्यंग्य,साथ ही लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, लेख, समीक्षा, भूमिका, साक्षात्कार, नाटक आदि
  • प्रकाशित पुस्तके-
  • 1. भानुमति का पिटारा (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) / 2.खुल्लम खुल्ला (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) / 3.मेरी प्रिय ग़ज़लें (ग़ज़ल संग्रह) पुरस्कृत /4.मुस्कानें हैं ऊपर-ऊपर (ग़ज़ल संग्रह) पुरस्कृत / 5.दुग्गी, चैके, छक्के (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) / 6.अशोक अंजुम की प्रतिनिधि ग़ज़लें /7.तुम्हारे लिए ग़ज़ल (ग़ज़ल संग्रह) / 8.एक नदी प्यासी (गीत संग्रह) पुरस्कृत/ 9. जाल के अन्दर जाल मियाँ (व्यंग्य ग़ज़लें) पुरस्कृत/10. क्या करें कन्ट्रोल नहीं होता (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /11 . प्रिया तुम्हारा गाँव (दोहा-संग्रह) पुरस्कृत/ 12. यमराज आॅन अर्थ (नाटक संग्रह)/13. पढ़ना है (नाटक )/14. चम्बल में सत्संग(दोहा-संग्रह)/ 15.यूँ ही...(ग़ज़ल संग्रह) 
  • सम्पादित पुस्तकें:-
  • 1.श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य कविताएँ (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /2.अंजुरी भर ग़ज़लें (ग़ज़ल संकलन)/3.हास्य-व्यंग्य में डूबे, 136 अजूबे (हास्य-व्यंग्य कविताएँ)/4. हास्य भी, व्यंग्य भी (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /5. ग़ज़ल से ग़ज़ल तक (ग़ज़ल संग्रह) /6. रंगारंग हास्य कवि सम्मेलन (हास्य-व्यंग्य)/7. आह भी वाह भी (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /8. लोकप्रिय हास्य-व्यंग्य कविताएँ (हास्य-व्यंग्य कविता संक.) /9. लोकप्रिय हिन्दी ग़ज़लें (ग़ज़ल संकलन)/10. दोहे समकालीन (दोहा संकलन) /11. रंगारंग दोहे (दोहा संकलन) /12. दोहा दशक (दोहा संकलन) /13. दोहा दशक-2(दोहा संकलन) /14. दोहा दशक-3 (दोहा संकलन)/15. हँसता खिलखिलाता हास्य कवि सम्मेलन (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /16. व्यंग्य भरे कटाक्ष (व्यंग्य लघुकथाएँ) /17. हँसो बत्तीसी फाड़ के (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /18. नई सदी के प्रतिनिधि ग़ज़लकार (ग़ज़ल संकलन) /19. हँसी के रंग कवियों के संग (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /20.ग़ज़लें रंगबिरंगी (हास्य-व्यंग्य ग़ज़ल संग्रह) /21. व्यंग्य कथाओं का संसार (व्यंग्य लघुकथाएँ) /22. नीरज के प्रेम गीत (गीत संग्रह) /23. नई सदी के प्रतिनिधि दोहाकार (दोहा संकलन) /24.श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य गीत (गीत संकलन) /25. हास्य एवं व्यंग्य ग़ज़लें (हास्य व्यंग्य ग़ज़ल संकलन)/26.नए युग के बीरबल (व्यंग्य लघुकथाएँ)/27. हास्य कवि दंगल (हास्य व्यंग्य कविताएँ)/28. हिंदी के लोकप्रिय ग़ज़लकार (पद्मभूषण नीरज के साथ संपादित)/ 29.नए दौर की ग़ज़लें (ग़ज़ल संग्रह)/30.आनन्द आ गया (आनन्द गौतम की व्यंग्य कविताओं का संपादन)/31.आधुनिक कवयित्रियाँ (काव्य संकलन)/32.आधुनिक लोकप्रिय दोहाकार (दोहा संकलन) /33. शेर ग़ज़ब के ( अश्आर संकलन)
  • अशोक अंजुम: व्यक्ति एवं अभिव्यक्ति ( श्री जितेन्द्र जौहर द्वारा संपादित ) 
  • सम्पादक - अभिनव प्रयास (कविता को समर्पित त्रैमा.) 
  • सलाहकार सम्पादक- हमारी धरती (पर्यावरण द्वैमासिक)
  • अतिथि संपा -1. प्रताप शोभा (त्रैमा.) (सुल्तानपुर) का दोहा विशेषाक/ 2. खिलखिलाहट (अनि.) (सुतानपुर) का हास्य-व्यंग्य ग़ज़ल विषेशांक/ 3.सरस्वती सुमन (त्रैमा0) देहरादून का दोहा विशेषांक/ 4. हमारी धरती (द्वै0मा0) के दो जल विशेषांक तथा एक प्राकृतिक आपदा विशेषांक का अतिथि संपादन
  • अध्यक्ष-दृष्टि नाट्य मंच , अलीगढ़ / सचिव - संवेदना साहित्य मंच, अलीगढ़/पूर्व सचिव- हरीतिमा पर्यावरण सुरक्षा मंच, अलीगढ़/ सदस्य- बोर्ड आॅफ एडवाइजर्स-1999(अमेरिकन बायोग्राफिक्स इंस्टी. अमेरिका) 
  • सम्मानोपधियाँ- विशिष्ट नागरिक, राष्ट्र भाषा गौरव, हास्य-व्यंग्य अवतार, श्रेष्ठ कवि, लेखकश्री, काव्यश्री, साहित्यश्री, समाज रत्न, हास्यावतार, मेन आफ द इयर, साहित्य शिरोमणि......आदि दर्जनों सम्मानोपाधियाँ 
  • पंकज उधास (चर्चित गायक), श्री साहब सिंह वर्मा (तत्कालीन मुख्यमंत्री ),ज्ञानी जैलसिंह (भू.पू.राष्ट्र पति) श्री मुलायम सिंह यादव (त.मुख्यमंत्री, उ.प्र.), सांसद शीला गौतम (अलीगढ़),श्री आई.एस.पर्सवाल (महाप्रबंधक एन.टी.पी.सी. दादरी), श्री कन्हैयालाल सर्राफ(चर्चित उद्योगपति, मुम्बई), महामहिम के.एम.सेठ.(राज्यपाल छ.ग.),श्री रवेन्द्र पाठक (महापौर,कानपुर ) लेफ्टि.कर्नल श्री एस.एन.सिन्हा (पूर्व राज्यपाल असाम, जम्मू-कश्मीर) श्री टी. वेंकटेश ( कमिश्नर , अलीगढ ) इत्यादि गणमान्य हस्तियों द्वारा विशिष्ट समारोहों में सम्मानित।
  • पुरस्कार-श्रीमती मुलादेवी काव्य-पुरस्कार (भारत भारती साहित्य संस्थान) द्वारा ‘मेरी प्रिय ग़ज़लें’ पुस्तक पर 1995/- स्व. रुदौलवी पुरस्कार (मित्र संगम पत्रिका, दिल्ली) /-दुश्यंत कुमार स्मृति सम्मान-1999 (युवा साहित्य मंडल, गाज़ियाबाद )-सरस्वती अरोड़ा स्मृति काव्य पुरस्कार-2000 (भारत-एषिआई साहित्य अका., दिल्ली )/- डाॅ0 परमेश्वर गोयल व्यंग्य षिखर सम्मान-2001 ( अखिल भारतीय साहित्य कला मंच , मुरादाबाद )/-रज़ा हैदरी ग़ज़ल सम्मान-2005 ( सृजनमंच, रायपुर (छ.ग.)/- साहित्यश्री पुरस्कार-2009, डाॅ.राकेशगुप्त, ग्रन्थायन प्रकाशन, अलीगढ़/- स्व. प्रभात शंकर स्मृति सम्मान-2010, नमन प्रकाशन तथा माध्यम संस्था, लखनऊ/- विशाल सहाय स्मृति सम्मान-2010, मानस संगम, कानपुर/- मालती देवी-विलसन प्रसाद सम्मान-2010,अतरौली /.फणीश्वरनाथ रेएाु स्मृति सम्मान-2011, वाग्वैचित्र्य मंच,अररिया (बिहार)से ‘जाल के अन्दर जाल मियाँ’ पुस्तक पर/- राष्ट्रधर्म गौरव सम्मान -2012, राष्ट्रधर्म प्रकाशन, लखनऊ,‘प्रिया तुम्हारा गाँव’ पुस्तक पर/-सेवक स्मृति सम्मान-2012, साहित्यिक संघ, वाराणसी /-हिन्दी सेवी सम्मान-2013, हिन्दी साहित्य विकास परिषद्, धनबाद (झारखण्ड)/- दुश्यंत स्मृति सम्मान-2013 एअन्तर्राष्ट्रीय साहित्य कला मंच, मेरठ/स्व.सरस्वती सिंह हिन्दी विभूति सम्मान-2013,कादम्बरी, जबलपुर/नीरज पुरस्कार-2014ए (1 लाख 1 हज़ार रुपए) अलीगढ़ कृषि प्रदार्शनी द्वारा
  • अन्य. अलीगढ़ एंथम के रचयिता - अनेक गायकों द्वारा ग़ज़ल, गीत गायन/विभिन्न नाटकों में अभिनय व गीत तथा स्क्रिप्ट लेखन/कवि सम्मेलनों में हास्य-व्यंग्य तथा गीत, ग़ज़ल, दोहों के लिए चर्चित / संयोजन व संचालन भी/- दूरदर्षन के राष्ट्रीय प्रसारण के साथ ही सब टी.वी,एन.डी टी.वी, ई.टी.वी, लाइव इण्डिया,तरंग चैनल आदि अनेक चैनल्स के साथ ही आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से प्रसारण/ ई.टी.वी के एक लोकप्रिय हास्य कार्यक्रम में जज/ अनेक षोध ग्रन्थों में प्रमुखता से उल्लेख/सैकड़ों समवेत संकलनों में तथा देष की अधिकांष चर्चित पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में सैकड़ों रचनाएँ प्रकाशित/विभिन्न रेखांकन पुस्तकों व पत्रिकाओं के आवरण पर प्रकाशित
  • सम्प्रति-सन्त पिफदेलिस स्कूल, ताला नगरी, रामघाट रोड, अलीगढ़ -202001 
  • सम्पर्क-गली.2,चंद्रविहार कालोनी;नगला डालचन्द, क्वारसी बाईपास, अलीगढ़-202 001 ,
  • मोबाइल नं.- 09258779744/ 09358218907
  • ईमेल : ashokanjumaligarh@gmail.com 
  • ब्लॉग : ashokanjum.blogspot.in