सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

कल्पना रामानी के गीत


विनोद शाही की कलाकृति

बेटियों नाव बचानी है..


खुद थामो पतवार,
बेटियों, नाव बचानी है।
मझधारे से तार,
तीर तक लेकर जानी है।

क्यों निर्भर हो तुम समाज पर।
जिसकी नज़रें सिर्फ राज पर।
तमगा उससे छीन बेटियों,
करो दस्तखत स्वयं आज पर।

पत्थर की इस बार
मिटे, जो रेख पुरानी है।

यह समाज बैठा है तत्पर।
गहराई तक घात लगाकर।
तुम्हें घेरकर चट कर लेगा,
मगरमच्छ ये पूर्ण निगलकर।

हो जाए लाचार,
इस तरह, जुगत भिड़ानी है।

हों वज़ीर के ध्वस्त इरादे।
कुटिल चाल चल सकें न प्यादे।
इस बिसात का हर चौख़ाना,
एक सुरक्षित कोट बना दे।

निकट न फटके हार,
हरिक यूँ गोट जमानी है।


खुशबू के पल भीने से..


खुशबू के पल भीने से 
रंग चले निज गेह, सिखाकर
मत घबराना जीने से।
जंग छेड़नी है देहों को,
सूरज, धूप, पसीने से।

शीत विदा हो गई पलटकर।
लू लपटें हँस रहीं झपटकर।
वनचर कैद हुए खोहों में,
पाखी बैठे नीड़ सिमटकर।

सुबह शाम जन लिपट रहे हैं,
तरण ताल के सीने से।

तले भुने पकवान दंग हैं।
शायद इनसे लोग तंग हैं।
देख रहे हैं टुकुर-टुकुर वे,
फल, सलाद, रस के प्रसंग हैं।

मात मिली भारी वस्त्रों को,
गात सज रहे झीने से।

गोद प्रकृति की हर मन भाई।
दुपहर एसी कूलर लाई।
बतियाती है रात देर तक,
सुबह गीत गाती पुरवाई।

बाँट रहे गुल बाग-बाग में,
खुशबू के पल भीने से।


गीत कोकिला गाती रहना..


बने रहें ये दिन बसंत के,
गीत कोकिला गाती
रहना।

मंथर होती गति जीवन की,
नई उमंगों से भर जाती।
कुंद जड़ें भी होतीं स्पंदित,
वसुधा मंद-मंद मुसकाती।

देखो जोग न ले अमराई,
उससे प्रीत जताती
रहना।

बोल तुम्हारे सखी घोलते,
जग में अमृत-रस की धारा।
प्रेम-नगर बन जाती जगती,
समय ठहर जाता बंजारा।

झाँक सकें ना ज्यों अँधियारे,
तुम प्रकाश बन आती
रहना।

जब फागुन के रंग उतरकर,
होली जन-जन संग मनाएँ।
मिलकर सारे सुमन प्राणियों
के मन स्नेहिल भाव जगाएँ।

तब तुम अपनी कूक-कूक से
जय उद्घोष गुँजाती
रहना।


गुलमोहर की छाँव..



गुलमोहर की छाँव, गाँव में
काट रही है दिन एकाकी।

ढूँढ रही है उन अपनों को,
शहर गए जो उसे भुलाकर।
उजियारों को पीठ दिखाई,
अँधियारों में साँस बसाकर।

जड़ पिंजड़ों से प्रीत जोड़ ली,
खोकर रसमय जीवन-झाँकी।

फल वृक्षों को छोड़ उन्होंने,
गमलों में बोन्साई सींचे।
अमराई आँगन कर सूने,
इमारतों में पर्दे खींचे।

भाग दौड़ आपाधापी में,
बिसरा दीं बातें पुरवा की।

बंद बड़ों की हुई चटाई,
खुली हुई है केवल खिड़की।
किसको वे आवाज़ लगाएँ,
किसे सुनाएँ मीठी झिड़की।

खबरें कौन सुनाए उनको,
खेल-खेल में अब दुनिया की।

फिर से उनको याद दिलाने,
छाया ने भेजी है पाती।
गुलमोहर की शाख-शाख को
उनकी याद बहुत है आती।

कल्प-वृक्ष है यहीं उसे,
पहचानें और न कहना बाकी।


पंछी उदास हैं..



गाँवों के पंछी उदास हैं
देख-देख सन्नाटा भारी।

जब से नई हवा ने अपना,
रुख मोड़ा शहरों की ओर।
बंद किवाड़ों से टकराकर,
वापस जाती है हर भोर।

नहीं बुलाते चुग्गा लेकर,
अब उनको मुंडेर, अटारी।

हर आँगन के हरे पेड़ पर,
पतझड़ बैठा डेरा डाल।
भीत हो रहा तुलसी चौरा,
देख सन्निकट अपना काल।

बदल रहा है अब तो हर घर,
वृद्धाश्रम में बारी-बारी।

बतियाते दिन मूक खड़े हैं।
फीकी हुई सुरमई शाम।
घूम-घूम कर ऋतु बसंत की,
हो निराश जाती निज धाम।

गाँवों के सुख राख़ कर गई,
शहरों की जगमग चिंगारी।


कल्पना रामानी 


  • जन्म तिथि-6 जून 1951 (उज्जैन-मध्य प्रदेश) 
  • शिक्षा-हाईस्कूल तक 
  • रुचि- गीत, गजल, दोहे कुण्डलिया आदि छंद-रचनाओं में विशेष रुचि।  
  • वर्तमान में वेब की सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रिका ‘अभिव्यक्ति-अनुभूति’ की सह संपादक। 
  • प्रकाशित कृतियाँ-नवगीत संग्रह-‘हौसलों के पंख’ 
  • निवास-मुंबई महाराष्ट्र  
  • ईमेल- kalpanasramani@gmail.com

सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

कृष्णानंद चौबे की ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


अपने मुक़द्दर में नहीं..


मंदिरों में आप मन चाहे भजन गाया करें,
मैकदा ये है यहाँ तहज़ीब से आया करें।


रात की ये रौनकें अपने मुक़द्दर में नहीं,
शाम होते ही हम अपने घर चले आया करें।


साथ जब देता नहीं साया अँधेरे में कभी,
रौशनी में ऐसी शय से क्यूँ न घबराया करें।


बन्द रहते हैं जो अक्सर आम लोगो के लिये,
अपने घर में ऐसे दरवाज़े न लगवाया करें।


ये हिदायत एक दिन आयेगी हर स्कूल में,
मुल्क की तस्वीर बच्चों को न दिखलाया करें।


क्यूँ नहीं आता है इन तूफ़ानी लहरों को शऊर,
कम से कम कागज़ की नावों से न टकराया करें।


सफ़र डूब रहा है..


दुनिया की ले के खैर-ख़बर डूब रहा है,
तय कर लिया सूरज ने सफ़र डूब रहा है।


हम मंदिरों-मस्जिद को बचाने में लगे हैं,
घर की है नहीं फ़िक्र के घर डूब रहा है।


मँझधार में नेता जो दिखा, लोग ये बोले,
अच्छा है अजी डूबे अगर डूब रहा है।


उस डूबने वाले के मुक़द्दर को कहें क्या,
तिनके का सहारा है मगर डूब रहा है।


तस्वीर बनाते हैं जो कपड़ों के बिना ही,
उन काँपते हाथों से हुनर डूब रहा है।


ख़ुशी भी नहीं..


हमारे चेहरे पे ग़म भी नहीं ख़ुशी भी नहीं,
अँधेरा पूरा नहीं पूरी रौशनी भी नहीं।


है दुश्मनों से कोई ख़ास दुश्मनी भी नहीं,
जो दोस्त अपने हैं उनसे कभी बनी भी नहीं।


मैं कैसे तोड़ दूँ दुनिया से सारे रिश्तों को,
अभी तो पूरी तरह उससे लौ लगी भी नहीं।


अजीब रुख़ से वो बातों को मोड़ देता है
कि जैसे बात ग़लत भी नहीं, सही भी नहीं।


तुम्हारे पास हक़ीक़त में इक समन्दर है,
हमारे ख्व़ाब में छोटी-सी इक नदी भी नहीं।


कोई बताये ख़ुशी किसके साथ रहती है,
हमें तो एक ज़माने से वो दिखी भी नहीं।


लो फिर से आ गये बस्ती को फूँकने के लिये,
अभी तो पहले लगाई हुई बुझी भी नहीं।


अजीब बात है दीपावली के अवसर पर
करोड़ो बच्चों के हाथों में फुलझड़ी भी नहीं।


तुम्हारा नाम आया रात भर..


पूछिये मत क्यों नहीं आराम आया रात भर,
उनके आने का ख़याले-ख़ाम आया रात भर।


और लोगो की कहानी सुन के मैं करता भी क्या,
मेरा अफ़साना ही मेरे काम आया रात भर।


याद करने को ज़माने भर के ग़म भी कम न थे,
भूलने को बस तुम्हारा नाम आया रात भर।


मयकदे से तश्नालब लौटे थे शायद इसलिये
ख्व़ाब में रह-रह के ख़ाली जाम आया रात भर।


देखना है अब कहाँ रह पायेगी तौबा मेरी,
मेरे ख़्वाबों में उमरख़य्याम आया रात भर।


वक़्त कम है काम काफ़ी दोस्तो कुछ तो करो,
उम्र के ख़ेमे से ये पैग़ाम आया रात भर।


ख़ुद पर तो एतबार आये..


क्या ये मुमकिन नहीं भार आये,
और आये तो बार-बार आये।


आप पर एतबार कर तो लूँ,
पहले ख़ुद पर तो एतबार आये।


जिसने मुझको दिये थे ग़म ही ग़म,
अपनी ख़ुशियाँ उसी पे वार आये।


चार दिन की ये ज़िन्दगी का लिबास,
कुछ ने पहना है, कुछ उतार आये।


बेवफ़ा होंगे वो किसी के लिये,
मुझसे मिलने तो बार-बार आये।


ख्व़ाब को ख्व़ाब की तरह देखो,
फूल आये ये उसमे ख़ार आये।



पं. कृष्णानंद चौबे


  • जन्म : 5 अगस्त 1913 (फर्रुखाबाद)
  • निधन : 14 मार्च 2010 (कानपुर)
  • शिक्षा : स्नातक
  • जीवन : सन् 1953 से 1960 तक बनारस से प्रकाशित ‘अमृत पत्रिका’ दैनिक में उप-सम्पादक। सन् 1961 से 1980 तक उद्योग निदेशालय (उ.प्र.) कानपुर में ‘इंडस्ट्रीज़ न्यूज़ लेटर’ का सम्पादन। सन् 1990 में सेवानिवृत होने के उपरान्त जीवनपर्यंत दैनिक जागरण, कानपुर से सम्बद्ध रहे।
  • विशेष : साहित्य की विविध विधाओं यथा गीत, ग़ज़ल, हास्य-व्यंग्य, आलेख. समीक्षा एवं पत्रकारिता में निरंतर सृजनरत रहे।

पुस्तक समीक्षा-'हथेलियों में सूरज' (काव्य संग्रह)-मंजु महिमा





मुझे उड़ना ही होगा..



        'हथेलियों में सूरज' यूँ ही नहीं उग जाता, हथेलियों को इस
काबिल बनाना पड़ता है कि वे सूरज की गर्माहट,ऊर्जा तथा रौशनी को अपने भीतर
समेट सकें! मंजु 'महिमा' एक संवेदनशील कवयित्री है। नारी-सुलभ संकोच,
सहनशीलता, भद्रता ,गंभीरता, करुणा उनके व्यक्तित्व के अंग हैं और उनका
यही व्यक्तित्व उनकी ठहरी हुई सोच को जन्म देकर अनायास मन के भीतर के
कपाट खोलकर पाठक को उनसे बाबस्ता करता है, पाठक कविता के साथ-साथ चलते
हुए निरंतर उनका सानिध्य महसूस करता है।
            हथेलियों में उतरे हुए सूरज का बिंब उनके भीतर की रौशनी और
ऊर्जा है जिसे उन्होंने न जाने कितने-कितने अंधेरों से जूझकर अपने भीतर
समोया है। कवयित्री अपनी भाषा हिन्दी की ज़बरदस्त पक्षधर हैं, हिन्दी को
'तुलसी -क्यारे' के रूप में बिंबित करना उनकी अपनी भाषा के प्रति
आत्मीयता का स्पंदन है जो उनकी रगों में बह रहा है।
          नारी की स्वाभाविक संवेदनशीलता तथा करुणा से ओत-प्रोत मंजु
की कविता चाहे 'मुझे पतंग न बनाओ' हो, ‘चाहे चिड़िया न बनना’, हो या फिर
'माँ !आ अब लौट चलें' हो, सबमें नारी के स्वतन्त्र परन्तु एक ऐसे बंधन की
स्पष्ट छाप प्रदर्शित होती है जो मर्यादित स्वतंत्रता की चाह में भी एक
कोमल बंधन की आशा रखता है।
              'खूब छूट दो उड़ने की
              पर डोर से बांधे रखो अपनी
              तुम्हारे प्यार की डोर से बंधी
              तुम्हारी हथेलियों पर
              चुग्गा चुगने चली आऊँगी ।'

        यह उड़ने की चाह और साथ ही एक ही हथेली पर चुग्गा चुगना उनके
भीतर की कोमल संवेदना को पाठक के समक्ष अनायास ही एक ऐसी चिड़िया के समीप
ला खड़ा करता है जो पिंजरे से निकलकर अनंत अवकाश में अपने पर फैलाती तो है
पर विश्राम करने अपने पिंजरे में स्वेच्छा से अपनेपन के अहसास में लिपटी
लौट आती है। यह 'मुक्त-बंधन' की चाह तथा अपनेपन का गहरा अहसास उनकी
नारी-संवेदना को प्रखर करता है ।
        नारी-जीवन के विभिन्न आयामों को उद्घाटित करती हुई उनकी
कविताएं नारी-ह्रदय के कितने समीप हैं, यह उनकी कविताओं में बहुत स्पष्ट
है, ये अंतर को एक पावस अहसास से भर देती हैं। नारी के स्वतन्त्र
व्यक्तित्व की पक्षधर मंजु महिमा अपनी सीमाओं में रहकर अपने अधिकार के
लिए चुनौती देती दृष्टव्य होती हैं, कहती हैं ----
            'मुझे उड़ना ही होगा ,
            मैं बिना उड़े नहीं रह सकती
            मुझे देखना ही होगा
            मैं अनदेखा नहीं कर सकती ।'

        शिद्द्त के साथ अपनी इस भावना को सरेआम न केवल रखना  वरन  उस पर
जमकर पांव रखना तथा दृढ़ता से चलना उनकी श्रेष्ठ कविता से पूर्व उनकी एक
संवेदनशील श्रेष्ठ नारी के सम्मान को गौरवान्वित करते हैं ।
          मंजु की यह कोमल स्त्रीयोचित करुणा उनकी रचना 'माँ! अब लौट
चलें' में स्त्री की करुणा, आज के युग में भी बेचारगी की साक्षी बनकर
पाठक के समक्ष आ उपस्थित होती है। ''माँ अब लौट चलें' में उनके मन की गहराई में उतरी पीड़ा
कितने स्प्ष्ट शब्दों में मुखरित हुई है ----
            जहाँ तुम्हें सदैव
            औरत होने का कर्ज़ चुकाना पड़ता है ।
            और  इससे भी अधिक..
            तुम एक भोग्या हो,
            खर्चे की पुड़िया
            जब तुम पैदा हुईं थीं,
            तब थाली नहीं बजी थी...(कितनी गहन पीड़ा !!)
            तुम्हारे होने की खबर
            शोक-सभा में तब्दील हो गई थी...
            (सदियों से चला आ रहा शाश्वत सत्य )

        भीतर से पीड़ित, स्त्री के नैसर्गिक अहसास के सम्मान को महसूसते
हुए मंजु कभी भी कमज़ोर अथवा बेचारगी का जामा पहनकर करुणा तथा दया की
याचना नहीं करती दिखाई देतीं । वे अपने व्यक्तित्व के लिए हर पल एक खामोश
युद्ध के लिए तत्पर रही हैं इसीलिए वे अपने बच्चों की ढाल बनकर उनके
व्यक्तित्व को पुचकारती हुई उन्हें विमर्श देती हैं ----
            चिड़िया बनना मेरी नियति थी
            पर,मेरे बच्चों !
            तुम कभी ‘चिड़िया’ न बनना !

  साथ ही वे माँ को कितनी शिद्द्त से, साहस से भरोसा देती हुई दिखाई देती हैं ---
            माँ ! डरो  नहीं, मैं उतनी कमज़ोर नहीं ।
            जो दुनिया का सामना नहीं कर पाऊँगी ।

          मंजु जी की रचनाओं में मुझे वे सदैव एक कैनवास पर लिखे गए एक
चित्र की भांति प्रतीत हुई हैं जिनमें उनके प्रतबिंबित होने का अहसास हर
पल बना रहता है । 'प्रकृति के सानिध्य में' नैनीताल के चार प्रहरों को उन्होंने
जिस प्रकार से समय को  विभाजित किया है,वह उनकी स्त्री के प्रति एक गहरी
तथा कोमल अनुभूति का प्रतीक लगता है..
नैनीताल की झील उन्हें प्रात:काल में..अल्हड कन्या
मध्यान्ह में..सुघड़ गृहिणी 

संध्या में..भाल पर सिंदूरी टीका लगाए आतिथ्य करती प्रसन्नवदन सधवा 
रात्रि में..दुल्हन सी संवरी स्वयं पर मोहित समर्पण की आतुरता लिए 

कोमलांगी प्रतीत होती है ।


          जीवन के विभिन्न आयामों को सहेजे उनकी कविताएं चाहे इस संग्रह
में हों या न हों मुझे सदा उनकी पारदर्शिता एक झीना अहसास दिलाती हैं।
यही पारदर्शिता मैंने मंजु के व्यक्तित्व में सदा से पाई है जो उन्हें
एक अच्छी कवयित्री से भी पूर्व एक अच्छे संस्कारी इंसान के रूप में
उद्घाटित करती है । मेरे मन में, जीवन में कुछ भी अच्छा बनने से पूर्व एक
अच्छे इंसान होने का मोल बहुत ऊँचा है। मन के भीतर अपने शब्दों के
माध्यम से उतर जाने वाली यह कवयित्री अपने पारदर्शी स्नेहिल व्यक्तित्व
से भी सबको सदा जीतती आई है।
          हमारे हज़ारों सलाम
          हैं उनके नाम
          जो चलते नहीं..किसी के बनाए रास्तों पर
          बनाते हैं स्वयं अपनी राह
          और..छोड़ जाते हैं एक छाप
          दिलों की ज़मीन पर..
                    ( प्रणव भारती )

    स्वागत है 'हथेलियों पर उगते हुए सूरज' का जो हमें भी एक नयी ऊर्जा तथा दिशा देगा मंजु महिमा
के साहित्यिक गौरवपूर्ण कदम का स्वागत है। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि  इस पुस्तक में संगृहित उनकी कविताएं पाठक को उनके अहसासों से जुड़ने के लिए बाध्य कर देंगी..आमीन !
     
  • पुस्तक-.'हथेलियों में सूरज' (काव्य संग्रह)
  • रचनाकार-मंजु महिमा
  • प्रकाशक-नव्या प्रकाशन, सुरेन्द्र नगर, गुजरात.

डॉ.प्रणव भारती


(कथाकार एवं गीतकार),
पूर्व फेकल्टी,
एन.आई.डी एवं फिल्म इंस्टिट्यूट,
अहमदाबाद (गुजरात)

सोमवार, 28 सितंबर 2015

डॉ.अनिता कपूर की कविताएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

तुम्हें छू लेती हूँ


तुम्हें छू लेती हूँ
खाली कागज़ पर शब्दों से
पेंटिंग में भर के रंग
ठहरे पानी में फैक के कंकड़
बरसती बूंदों को तन पर छुआ कर
पेड़ से टपके पत्ते की शरारत से
तुम मेरे पास नहीं
फिर भी तुम्हें छू लेती हूँ
अहसासों के कुंड में नहा कर
छूने के लिए पास होना जरूरी तो नहीं


मन की सड़क


मत दिखाओ मेरे पावोँ को
अपने मन की सड़क
फिर क्या पता वो रास्ता
मुझे रास आ जाए।
महरों-माह की चमक रहेगी
ताउम्र हमारे रिश्तों पर
ख़्यालों का यूं फिसलना
रातों को रास आ जाये।
थकने लगे हैं अब तो
तेरी-मेरी परछाइयों के भी पाँव
ए जिंदगी तेरा धीरे चलना
थकान को रास आ जाए।
जिंदगी जो बन गयी थी
तेज़ाब की उफनती नदी
क्या पता किसी रिश्ते को
फिर तैरना रास आ जाये।
वफ़ा की बात करते हो
तमाम रास्ते तिरगी करके
इतिहास जीने के लिए, फिर
अनारकली होना रास आ जाए।


अलाव


तुमसे अलग होकर
घर लौटने तक
मन के अलाव पर
आज फिर एक नयी कविता पकी है
अकेलेपन की आँच से
समझ नहीं पाती
तुमसे तुम्हारे लिए मिलूँ
या एक और
नयी कविता के लिए ?


फागुनी मन


सपनों में भर के रंग
अक्सर भूल जाया करते हैं
कि पेड़ों के सायों को भी
धूप सताती है



सपनों की रंगीन स्याही से


हाथ की टूटी लकीरों पर
कुछ इबारत जब जब लिखी है
रात आ कर
हथेली को रगड़ गई हैं
स्याही चूस


वक्त की खूंटी पर


मेरी जिंदगी को
टांग कर अक्सर
मेरे ही दर्द
नहाने चल देते हैं
नदी में
उजले हो कर लौटते हैं
और
गुनगुनाते हुए
मेरी पीढ़ा के दंश को
नाग बन चूस लेते हैं
सहमे से मेरे प्राण
सुख के खरगोश
ढूंढने लगते हैं।


बोंजाई


हर रोज़ यह चाँद
रात की चोकीदारी में
सितारों की फ़सल बोता है
पर चाँद को सिर्फ बोंजाई पसंद है
तभी तो वो सितारों को
कभी बड़ाही नहीं होने देता है ।


आँखों की सड़क


मेरी आँखों की सड़क पर
जब तुम चलकर आते थे
कोलतार मखमली गलीचा बन जाता था
मेरी आँखों की सड़क से जब
तुम्हें वापस जाते देखती थी
वही सड़क रेगिस्तान बन जाती थी

तुम फिर जब-जब वापस नहीं आते थे 
रेगिस्तान की रेत 
आँख की किरकिरी बन जाती थी
आँखों ने सपनों से रिश्ता तोड़ लिया था
फिर मुझे नींद नहीं आती थी




उसके जाने के बाद


उसके जाने के बाद मैं
ताकती रही उसके क़दमों के निशाँ
मैंने कहा था उसे
हो सके तो उन्हें भी साथ ले जाना
अब कितना मुश्किल है उसका जाना…
जिंदगी के जाने के बाद मै
छूती रही उसकी परछाई के निशां
मैने कहा था उसे
हो सके तो साँसे भी साथ ले जाना
अब कितना मुश्किल है जीना ….
यादों के जल जाने के बाद मै
बिनती रही उसकी राख़ के निशाँ
मैने कहा था उसे
हो सके तो राख़ उढ़ा ले जाना
अब कितना मुश्किल हैं
ढेर में जीना….



डॉ अनिता कपूर 


  • शिक्षा : एम.ए. हिन्दी, अँग्रेजी एवं संगीत (सितार), पी.एचडी (अँग्रेजी),पत्रकारिता में डिप्लोमा 
  • कार्यरत : अमेरिका से प्रकाशित हिन्दी समाचारपत्र “यादें” की प्रमुख,संपादक, “ग्लोबल वुमेन पावर” संस्था संस्था की को-फ़ाऊनडर
  • प्रकाशित कृतियाँ: बिखरे मोती, अछूते स्वर, ओस में भीगते सपने,कादंबरी, साँसों के हस्ताक्षर (कविता-संग्रह), दर्पण के सवाल (हाइकु-संग्रह), अनेकों भारतीय एवं अमरीका की पत्र-पत्रिकाओं में कहानी, कविता, कॉलम, साक्षात्कार एवं लेख प्रकाशित, प्रवासी भारतीयों के दुःख-दर्द और अहसासों पर एक पुस्तक शीघ्र प्रकाशीय.                
  • पुरस्कार/सम्मान:(2015) अमेरिका में कम्यूनिटी सम्मान,GOPIO द्वारा तथा मिलपिटस शहर के मेयर द्वारा सम्मानित, (2014) पंचवटी राष्ट्रभाषा सम्मान, समाज कल्याण बोर्ड द्वारा सम्मानित, अमेरिका के टीवी और गोपियो संस्था द्वारा कम्यूनिटी सम्मान-(2013) GOPIA (Global organization of People of Indian Origin), अमेरिका, द्वारा हिन्दी में योगदान के लिए सम्मान, -जोधपुर में “कथा-साहित्य एवं संस्कृति संस्थान” द्वारा  “सूर्य नगर शिखर सम्मान” (वर्ष 2012) ,-“कायाकल्प साहित्य-कला फ़ाउंडेशन” सम्मान (वर्ष 2012),-“कवयित्री सम्मेलन” आगरा द्वारा विशिष्ट सम्मान (वर्ष 2012) ,-महाराष्ट्र राज्य हिन्दी अकादमी और कथा यू.के द्वारा प्रवासी हिन्दी सेवी सम्मान (2012),-10 वां अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी उत्सव, नयी दिल्ली, प्रदत् “अक्षरम प्रवासी साहित्य सम्मान”,  (2012) ,प्रवासी हिन्दी सेवी सम्मान-2012,प्रवासी कवियत्री  सम्मान-2012,कायाकल्प साहित्य कला फ़ाउंडेशन-12 पॉलीवूड स्टार मीडिया अवार्ड-2011, सामाजिक सेवा अमरीका अवार्ड-2009  
  • संपर्क: Fremont, CA 94587, USA 
  • फोन: 510-894-9570
  • ईमेल: anitakapoor.us@gmail.com 

सोमवार, 21 सितंबर 2015

अंसार क़म्बरी की ग़ज़लें



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



ज़िन्दा रहे तो हमको..


ज़िन्दा रहे तो हमको क़लन्दर कहा गया.
सूली पे चढ़ गये तो पयम्बर कहा गया ।

ऐसा हमारे दौर में अक्सर कहा गया.
पत्थर को मोम, मोम को पत्थर कहा गया ।

खुद अपनी पीठ ठोंक ली कुछ मिल गया अगर
जब कुछ नहीं मिला तो मुक़द्दर कहा गया ।

वैसे तो ये भी आम मकानों की तरह था.
तुम साथ हो लिये तो इसे घर कहा गया ।

जिस रोज़ तेरी आँख ज़रा डबडबा गयी.
क़तरे को उसी दिन से समन्दर कहा गया ।

जो रात छोड़ दिन में भी करता है रहज़नी.
ऐसे सफेद पोश को रहबर कहा गया ।



तेरा आँचल जो..


तेरा आँचल जो ढल गया होता,
रुख़ हवा का बदल गया होता ।

देख लेता जो तेरी एक झलक,
चाँद का दम निकल गया होता ।

छू न पायी तेरा बदन वरना,
धूप का हाथ जल गया होता ।

झील पर ख़ुद ही आ गए वरना,
तुझको लेने कमल गया होता ।

मैं जो पीता शराब आँखों से,
गिरते-गिरते सँभल गया होता ।

माँगते क्यूँ वो आईना मुझसे,
मैं जो लेकर ग़ज़ल गया होता ।



हम कहाँ आ गये..


हम कहाँ आ गये आशियाँ छोड़कर,
खिलखिलाती हुई बस्तियां छोड़कर ।

उम्र की एक मंजिल में हम रुक गये,
बचपना बढ़ गया उँगलियाँ छोड़कर ।

नाख़ुदा ख़ुद ही आपस में लड़ने लगे,
लोग जायें कहाँ कश्तियाँ छोड़कर ।

आज अख़बार में फिर पढ़ोगे वही,
कल जो सूरज गया सुर्ख़ियाँ छोड़कर ।

लाख रोका गया पर चला ही गया,
वक़्त यादों की परछाईयाँ छोड़कर ।



बह रही है जहाँ पर नदी..


बह रही है जहाँ पर नदी आजकल,
जाने क्यूँ है वहीं तश्नगी आजकल ।

अपने काँधे पे अपनी सलीबे लिये,
फिर रहा है हर एक आदमी आजकल ।

बोझ काँधों पे है, ख़ार राहों में हैं,
आदमी की ये है ज़िन्दगी आजकल ।

पाँव दिन में जलें, रात में दिल जले,
घूप से तेज़ है  चाँदनी आजकल ।

एक तुम ही नहीं हो मेरे पास बस,
और कोई नहीं है कमी आजकल ।

अपना चेहरा दिखाये किसे ‘क़म्बरी’,
आईना भी लगे अजनबी आजकल ।



कोई खिलता गुलाब क्या जाने..


कोई खिलता गुलाब क्या जाने,
आ गया कब शबाब क्या जाने ।

गर्मिये-हुस्न की लताफ़त को,
तेरे रुख़ का नक़ाब क्या जाने ।

इस क़दर मैं नशे में डूबा हूँ,
जामो-मीना शराब क्या जाने1

लोग जीते हैं कैसे बस्ती में,
इस शहर का  नवाब क्या जाने ।

ए.सी. कमरों में बैठने वाले,
गर्मिए-आफ़ताब क्या जाने ।

नींद में ख़्वाब देखने वाले,
जागी आँखों के ख़्वाब क्या जाने ।

जिसको अल्लाह पर यकीन नहीं,
वो सवाबो-अज़ाब क्या जाने ।


अंसार क़म्बरी


 ‘ज़फ़र मंजिल’ 11/116, 
ग्वालटोली, कानपुर–208001
मो-9450938629/ 9305757691


अंसार क़म्बरी



  • जन्म : 3–11–1950
  • पिता का नाम : स्व.ज़व्वार हुसैन रिज़वी
  • लेखन : ग़ज़ल, गीत, दोहा, मुक्तक, नौहा, सलाम, यदा-कदा आलेख एवं पुस्तक समीक्षा आदि
  • प्रकाशित कृति : ‘अंतस का संगीत’ (दोहा व गीत काव्य संग्रह) 
  • सम्मान : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ व्दारा 1996 के सौहार्द पुरस्कार एवं समय-समय पर नगर व देश की अनेकानेक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं व्दारा पुरस्कृत व सम्मानित
  • सम्पर्क : ‘ज़फ़र मंजिल’ 11/116, ग्वालटोली, कानपुर–208001
  • मो - 9450938629/ 9305757691
  • ई-मेल : ansarqumbari@gmail.com

सोमवार, 14 सितंबर 2015

सुबोध श्रीवास्तव के दोहे


विनोद शाही की कलाकृति 


हिन्दी का संसार



भाषाओं में श्रेष्ठ है, प्रचुर ज्ञान भंडार।
सरस, सहज, मोहक लगे, हिन्दी का संसार॥

हिन्दी तो है हिन्द के, गौरव की पहचान।
हिन्दी को हम स्नेह दें, ना मिटने दें शान॥

सुनने में मीठी लगे,बोलन में आसान।
जन को जन से जोड़ती, हिन्दी मातृ समान॥

चंद दिनों तक ही रही, खिलती हुई उजास।
शेष वर्ष हिन्दी रही, बैठी अलग उदास॥

सरकारें तो देश की, करती रहीं बखान।
हिन्दी बैठी ही रही, पाने को सम्मान॥

अंग्रेजी खिलती गयी, हिन्दी रही उदास।
संविधान ने दे दिया, हिन्दी को वनवास॥

दुनिया में है जिस तरह, भारत देश महान।
वैसे ही है हिन्द की, हिंदी भाषा शान।।

भाषाएँ तो बाँटतीं, समरसता औ' प्यार।
भाषाओं के नाम पर, झगड़े हैं बेकार।।

हिंदी से रोजी मिली, हिंदी से ही शान।
पर बाबूजी कर रहे, अंग्रेजी का गान।।

बातें ही बातें रहीं, सरकारों के पास।
हिंदी बरसों से यही, झेल रही संत्रास।।

हिंदी की इस देश में, हालत बड़ी विचित्र।
संतानें हैं हिन्द की, अंग्रेजी की मित्र।।

जिसका घर में ही हुआ, पग-पग पर अपमान।
उस हिंदी का हो रहा, दुनिया में सम्मान।।

मन में हम यदि ठान लें, करना है उत्थान।
हर दिन बढ़ता जाएगा, हिंदी का सम्मान।।

पखवारे मनते रहे, हुआ नहीं कल्यान।
बहुत हुआ अब दीजिए, हिन्दी को सम्मान॥


सुबोध श्रीवास्तव


'माडर्न विला', 10/518,
खलासी लाइन्स,कानपुर (उप्र)-208001.
मो.09305540745
ई-मेल: subodhsrivastava85@yahoo.in



सुबोध श्रीवास्तव


  • जन्म: 4 सितम्बर, 1966 (कानपुर)
  • मां: श्रीमती कमला श्रीवास्तव
  • पिता: स्व.श्री प्रेम नारायण दीवान
  • शिक्षा: परास्नातक
  • व्यवसाय: पत्रकारिता (वर्ष 1986 से)। 'दैनिक भास्कर', 'स्वतंत्र भारत' (कानपुर/लखनऊ) आदि में विभिन्न पदों पर कार्य।
  • विधाएं: नई कविता, गीत, गजल, दोहे, मुक्तक, कहानी, व्यंग्य, निबंध, रिपोर्ताज और बाल साहित्य। रचनाएं देश-विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं,प्रमुख अंतरजाल पत्रिकाओं में प्रकाशित। दूरदर्शन/आकाशवाणी से प्रसारण भी।
  • प्रकाशित कृतियां:
  • 'सरहदें ' (काव्य संग्रह)
  • 'पीढ़ी का दर्द' (काव्य संग्रह)
  • 'ईष्र्या' (लघुकथा संग्रह)
  • 'शेरनी मां' (बाल कथा संग्रह)
  • विशेष: काव्यकृति 'पीढ़ी का दर्द' के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा पुरस्कृत।
  • साहित्य/ पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा 'गणेश शंकर विद्यार्थी अतिविशिष्ट सम्मान'।
  • कई अन्य संस्थाओं से भी सम्मानित।
  • संपादन: 'सुबोध सृजन' ई-पत्रिका
  • संप्रति: 'आज' (हिन्दी दैनिक), कानपुर में कार्यरत।
  • संपर्क: 'माडर्न विला',10/518, खलासी लाइन्स, कानपुर (उ.प्र.)-208001, उत्तर प्रदेश (भारत)।
  • फोन: 09305540745/ 9839364419
  • फेसबुक:www.facebook.com/subodhsrivastava85
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  • ई-मेल: subodhsrivastava85@yahoo.in

सोमवार, 7 सितंबर 2015

राधेश्याम बन्धु के गीत




चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



    कोलाहल हो या सन्नाटा



     कोलाहल हो
     या सन्नाटा, कविता सदा सृजन करती है,
     जब भी आंसू
     हुआ पराजित, कविता सदा जंग लड़ती है ।

     जब भी कर्ता हुआ अकर्ता
     कविता ने जीना सिखलाया,
     यात्रायें जब मौन हो  गयीं
     कविता ने चलना सिखलाया ।

     जब भी तम का
     जुल्म बढ़ा है,कविता नया सूर्य गढ़ती है ।

     गीतों  की जब पफसलें लुटतीं,
     शीलहरण होता कलियों का,
     शब्दहीन जब हुर्इ चेतना -
     तब-तब चैन लुटा गलियों का ।

     जब कुर्सी का
     कन्श गरजता,कविता स्वयं कृष्ण बनती है ।

     अपने भी हो गये पराये,
     यूं झूठे अनुबन्ध हो गये,
     घर में ही वनवास हो रहा,
     यूं गूंगे सम्बन्ध हो गये ।

     जब रिश्तों
     पतझड़ हंसता, कविता मेघदूत रचती है,
     कोलाहल हो या
     सन्नाटा, कविता सदा सृजन करती है ।
                   

     

   बैठकर नेपथ्य में



     बैठकर
     नेपथ्य में क्यों स्वयं से लड़ते ?
         जो नहीं
         हमदर्द हैं वे शब्द क्यों गढ़ते ?

     कभी पर्दे को उठा
     आकाश आने दो ।
     मौलश्री की गंध को
     भी गुनगुनाने दो ।

         कभी पंछी की
         चहक से, क्यों नहीं मिलते ?

     क्यों नयन की झील में है
     एक सन्नाटा ?
     हर कुहासे को सुबह की
     हंसी ने छांटा।

         क्यों सुनहले
         दिवस की मुस्कान से डरते ?

     प्यार के किरदार को
     मिलती सभी खुशियां,
     सृजन के ही मंच पर,
     मिलती सुखद छवियां ।

         क्यों न बादल
         बन किसी की तपन को हरते ?

     जो कला से दूर हैं
     वह जिन्दगी से दूर,
     पंखुड़ी के पास जो  हैं
     गंध से भरपूर।

         क्यों न अर्पण
         गंध बन हर हृदय में बसते ?
         बैठकर
         नेपथ्य में क्यों स्वयं से लड़ते ?
             


    अभी परिन्दों में  धड़कन है



     अभी परिन्दों में
     धड़कन है, पेड़ हरे हैं जिन्दा धरती,

     मत उदास हो
     छाले लखकर, ओ राही नदिया कब थकती ?

     चांद भले ही बहुत दूर हो
     पथ में नित चांदनी बिछाता,
     हर  गतिमान चरण की खातिर
     बादल खुद छाया बन जाता ।

     चाहे थके
     पर्वतारोही, दिन की धूप नहीं है ती ।

     फिर-फिर समय का पीपल कहता
     बढ़ो हवा की लेकर हिम्मत,
     बरगद का आशीष सिखाता
     खोना नहीं प्यार की दौलत ।

     पथ में रात
     भले घिर आये, दिन की यात्रा कभी न रुकती ।

     कितने ही पंछी बेघर हैं
     नीड़ों में बच्चे बेहाल,
     तम से लड़ने कौन चलेगा
     रोज दिये का यही सवाल?

     पग-पग है
     आंधी की साजि़श,पर मशाल की जंग न थमती,
     मत उदास हो
     छाले लखकर, ओ राही नदिया कब थकती ?
               


    शब्दों के कंधों पर



     शब्दों के
     कंधों पर, बर्फ का जमाव,
     कैसे चल
     पायेगी, कागज की नाव ?

     केसर की क्यारी में
     बारूदी शोर,
     काना फूसी करते,
     बादल मुंहजोर ।
     कुहरे की
     साजि़श से उजड़ रहे गांव ।

     मौसम है आवारा
     हवा भी खिलाफ,
     किरने भी सोयी हैं
     ओढ़कर लिहाफ ।
     सठियाये
     सूरज के ठंढे प्रस्ताव ।

     बस्ती को धमकाती
     आतंकी धूप,
     यौवन को बहकाता
     सिक्कों का रूप ।
     ठिठुरी
     चौपालों में उंफघते अलाव ।

     झुग्गी के हिस्से की
     धूप का सवाल,
     कौन हल करेगा बन
     सत्य की मशाल ?
     संशय के
     शिविरों में, धुन्ध का पड़ाव,
     कैसे चल पायेगी, कागज की नाव ?


               

     मोरपंख सपनों का आहत



     जब-जब क्रौच
     हुआ है घायल, गीत बहुत रोया,

     हर बहेलिए
     की साजि़श में, नीड़ों ने खोया ।

          जब महन्त आकाश ही करे
          बारूदी बौछार,
          पंछी कहां उड़ें फिर जाकर
          अपने पंख पसार ?
          हरियाली लुट गयी प्यार की
          टहनी सूख गयी,
          गूंगी हुर्इ  गांव की कोयल
          खुशियां रूठ गयीं।

     मोरपंख सपनों का
     आहत, डर किसने बोया ?

          चौपालों की चर्चा  में
          नपफरत की जंग छिड़ी
          खेतों में हथियार  उग रहे
          लुटती फसल खड़ी ।
          दाना कौन चुगायेगा
          गौरैया सोच रही ?
          बस कौवे का शोर, कबूतर

          कब से उड़ा नहीं ।


     भूला राम-राम
     भी सुगना, लगता है सोया ।

          पग-पग जहां शिकारी घायल
          किससे बात करे ?
          महानगर में हमदर्दी  का
          मरहम कौन धरे ?
          बाजों की बस्ती में सच की
          मैना हार गयी,
          अब बेकार हुयी ।

     शुतुरमुर्ग ने शीश झुकाकर, जुल्मों को ढोया,
     जब-जब क्रौच हुआ है घायल, गीत बहुत रोया ।

       


राधेश्याम बंधु


  • जन्म:10 जुलाई 1940 को पडरौना उत्तर प्रदेश (भारत) में
  • लेखन:नवगीत, कविता, कहानी, उपन्यास, पटकथा, समीक्षा, निबंध
  • प्रकाशित कृतियाँ-
  • काव्य संग्रह:बरसो रे घन, प्यास के हिरन
  • खंडकाव्य: एक और तथागत
  • कथा संग्रह : शीतघर
  • संपादित:जनपथ, नवगीत, कानपुर की काव्ययात्रा, समकालीन कविता, समकालीन कहानियाँ, नवगीत और उसका युगबोध। इसके साथ ही आपकी रचनाएँ भारत की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं तथा आकाशवाणी व दूरदर्शन से प्रकाशित प्रसारित हो चुकी हैं। वे 'समग्र चेतना' नामक पत्रिका के संपादक भी है।
  • पुरस्कार: भारत के प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा 'एक और तथागत' के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के 'जयशंकर प्रसाद पुरस्कार' तथा हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा पुरस्कृत व सम्मानित।
  • टेली फ़िल्में: बन्धुजी अपनी कथा/पटकथा पर आधारित 3 टेली-फ़िल्में- 'रिश्ते', 'संकल्प' और 'कश्मीर एक शबक' तथा 'कश्मीर की बेटी' धारावाहिक बना चुके हैं।
  • सम्प्रति: सहायक महाप्रबन्धक दूरसंचार किदवई भवन नई दिल्ली के पद से 2000 में सेवानिवृत्त।
  • सम्पर्क: बी-3/163, यमुना विहार, दिल्ली-110053